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वर्षों तक नहीं हो रही सुनवाई! उपभोक्ता आयोगों की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, फैसलों की गुणवत्ता पर भी उठे सवाल

उपभोक्ता को जल्द न्याय दिलाने के लिए बनी व्यवस्था अगर सालों तक तारीखों में उलझी रहे, तो सवाल उठना लाजिमी है। इसी गंभीर स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त को कड़ा रुख अपनाया। CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि कई मामलों में वर्षों तक सुनवाई नहीं हो रही है। इतना ही नहीं, जिला उपभोक्ता आयोगों में फैसलों की गुणवत्ता को लेकर भी अदालत ने “क्वालिटी क्राइसिस” की बात कही। अब सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC से देशभर की पेंडेंसी, सबसे पुराने मामलों और मामलों के निपटारे की स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।

Sonali13 अग. 2026, 09:39 PM IST
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वर्षों तक नहीं हो रही सुनवाई! उपभोक्ता आयोगों की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, फैसलों की गुणवत्ता पर भी उठे सवाल

नई दिल्ली, 13 अगस्त 2026:

 उपभोक्ताओं को तेज और प्रभावी न्याय दिलाने के लिए बनाए गए Consumer Commissions की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गंभीर चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, ने कहा कि कई लंबित मामलों में वर्षों तक सुनवाई तक नहीं हो रही है। कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर स्थिति माना और नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के अध्यक्ष से देशभर में लंबित मामलों की विस्तृत रिपोर्ट मांगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि समस्या केवल मामलों की संख्या तक सीमित नहीं है। जिला उपभोक्ता आयोगों में फैसलों की गुणवत्ता को लेकर भी “क्वालिटी क्राइसिस” है। अदालत ने यह पता लगाने की जरूरत बताई कि लंबित मामलों को खत्म करने के लिए क्या आयोगों में सदस्यों और बेंचों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी।

13 अगस्त की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता आयोगों के प्रदर्शन पर प्रकाशित एक रिपोर्ट का संज्ञान लिया। अदालत के सामने यह बात आई कि कई उपभोक्ता मामलों में वर्षों तक सुनवाई नहीं हो रही है। CJI सूर्यकांत ने संकेत दिया कि केवल infrastructure बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि मामलों के प्रभावी निपटारे की व्यवस्था भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर यही स्थिति बनी रहती है तो आयोगों की strength बढ़ाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बच सकता। अदालत ने NCDRC के साथ-साथ State Consumer Commissions की स्थिति भी अलग-अलग उपलब्ध कराने को कहा है।

NCDRC से मांगी गई पूरी जानकारी क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC के अध्यक्ष से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इसमें खास तौर पर यह जानकारी देनी होगी:

  • NCDRC में कुल कितने मामले लंबित हैं।

  • सबसे पुराना लंबित मामला कौन सा है।

  • साल-दर-साल कितने मामले लंबित हैं।

  • अलग-अलग बेंचों ने कितने मामलों का निपटारा किया।

  • मौजूदा पेंडेंसी खत्म करने में अनुमानित कितना समय लगेगा।

  • क्या आयोग की मौजूदा सदस्य संख्या पर्याप्त है या इसे बढ़ाने की जरूरत है।

इसी तरह की जानकारी State Consumer Commissions के लिए भी अलग से देने को कहा गया है।

जिला उपभोक्ता आयोगों में “क्वालिटी क्राइसिस”

सुप्रीम कोर्ट की चिंता सिर्फ देरी तक सीमित नहीं रही। CJI सूर्यकांत ने जिला उपभोक्ता आयोगों में मामलों के निपटारे की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाया। अदालत ने टिप्पणी की कि कई मामलों में शिकायत की प्रकृति और उसके merits पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इसका नतीजा यह होता है कि जिला स्तर पर मामले ठीक से तय नहीं होने पर वे State Commission और फिर National Commission तक पहुंचते हैं। इस तरह ऊपर की अदालतों पर भी मामलों का बोझ बढ़ता जाता है। यानी सुप्रीम कोर्ट के सामने समस्या की दो परतें हैं—एक तरफ मामलों की भारी पेंडेंसी और दूसरी तरफ शुरुआती स्तर पर निर्णयों की गुणवत्ता।

2019 में दाखिल मामले की वर्षों बाद भी सुनवाई नहीं

सुनवाई के दौरान CJI ने एक रिपोर्ट का उदाहरण भी दिया। अदालत के सामने ऐसा मामला आया जिसमें 2019 में शिकायत दाखिल होने के बाद लंबे समय तक प्रभावी सुनवाई नहीं हो सकी। इस उदाहरण का उल्लेख करते हुए अदालत ने यह चिंता जताई कि यदि किसी उपभोक्ता को अपने मामले की सुनवाई के लिए वर्षों इंतजार करना पड़े, तो Consumer Protection Act का त्वरित न्याय देने का उद्देश्य ही प्रभावित होता है।

बड़ी समस्या: सिर्फ पेंडेंसी नहीं, vacancies और bench composition भी

इस मामले को मजबूत बनाने वाला एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू Consumer Commissions में लंबे समय से चली आ रही staffing problem है। 2025 में प्रकाशित एक विस्तृत कानूनी analysis में NCDRC की bench composition और vacancies को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे। इसमें बताया गया था कि NCDRC की sanctioned strength 12 सदस्यों की थी, जबकि उस समय दो पद खाली थे। उपलब्ध सदस्यों में judicial और technical members के अनुपात को लेकर भी सवाल उठे थे। इस analysis में “Coram Non Judice” का मुद्दा उठाया गया था। इसका अर्थ है ऐसी बेंच द्वारा आदेश पारित किया जाना जिसका गठन कानून के अनुरूप न हो। विश्लेषण में ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया जहां NCDRC के आदेशों को उचित bench composition के अभाव में चुनौती दी गई। यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि किसी आयोग में पर्याप्त और उचित रूप से गठित बेंच उपलब्ध नहीं हैं, तो केवल सदस्यों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। नियुक्ति, judicial-technical expertise का संतुलन और उचित bench composition भी उतने ही जरूरी होंगे।

Consumer Forums को “rehabilitation centre” की तरह नहीं देखा जा सकता

हालिया कानूनी analysis में consumer commissions की नियुक्ति और functioning से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया है। इसमें यह तर्क सामने आया कि Consumer Commissions को केवल सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए “rehabilitation centres” के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि यह किसी न्यायिक आदेश की औपचारिक टिप्पणी नहीं बल्कि कानूनी विश्लेषण में उठाया गया विचार है, लेकिन यह मौजूदा बहस के एक महत्वपूर्ण पहलू को सामने लाता है—Consumer Commissions में नियुक्तियां केवल पद भरने के लिए नहीं, बल्कि प्रभावी consumer justice सुनिश्चित करने के लिए होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी vacancies पर कर चुका है निगरानी

Consumer Commissions में vacancies और infrastructure की समस्या नई नहीं है। 2021 से ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष District और State Consumer Commissions में Presidents, Members और staff की नियुक्तियों तथा infrastructure से संबंधित मुद्दा निगरानी में रहा है। इससे 13 अगस्त 2026 की सुनवाई का महत्व और बढ़ जाता है। कोर्ट अब केवल यह नहीं पूछ रहा कि कितने मामले लंबित हैं, बल्कि यह भी जानना चाहता है कि आखिर पेंडेंसी खत्म क्यों नहीं हो रही और इसके लिए संस्थागत स्तर पर कितनी अतिरिक्त क्षमता की आवश्यकता है।

जुलाई 2026 में भी सामने आया था rationalisation का मुद्दा

Consumer justice system में एक दिलचस्प स्थिति यह भी है कि सभी जगह समस्या एक जैसी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में मामलों की संख्या कम है, जबकि अन्य जगहों पर भारी पेंडेंसी है। जुलाई 2026 में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, कम लंबित मामलों वाले राज्यों में District Consumer Commissions को rationalise करने और उपलब्ध judicial resources को अधिक प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करने से जुड़े कदमों पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचार हुआ था। इसका अर्थ है कि आने वाले समय में consumer justice system में “one-size-fits-all” approach के बजाय pendency के हिसाब से आयोगों की संख्या, benches और manpower को पुनर्गठित करने पर जोर दिया जा सकता है।

सरकार भी पहले मान चुकी है कि पेंडेंसी बड़ी चुनौती है

यह समस्या केवल अदालत की हालिया चिंता नहीं है। केंद्र सरकार भी पहले Consumer Commissions में delayed disposal और भारी pendency को बड़ी चुनौती बता चुकी है। 2022 में उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने बताया था कि 14 जून 2022 तक National Commission में 22,608, State Commissions में 1,49,608 और District Commissions में 4,66,034 मामले लंबित थे। मंत्रालय ने Consumer Protection Act, 2019 के तहत मामलों को तेजी से निपटाने और mediation, e-filing तथा virtual hearings जैसे उपायों को बढ़ावा देने पर जोर दिया था। हालांकि, इन आंकड़ों को 2026 की वर्तमान पेंडेंसी नहीं माना जा सकता। इन्हें केवल यह दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है कि consumer forums में pendency की समस्या कई वर्षों से बनी हुई है।

कानून का उद्देश्य क्या है?

Consumer Protection Act, 2019 का उद्देश्य उपभोक्ताओं को goods और services से जुड़े विवादों में प्रभावी और समयबद्ध राहत उपलब्ध कराना है। Consumer justice की तीन-स्तरीय व्यवस्था में District, State और National Consumer Commissions शामिल हैं। NCDRC इस व्यवस्था का राष्ट्रीय स्तर का शीर्ष उपभोक्ता आयोग है। ऐसे में यदि District और State स्तर पर मामलों का प्रभावी ढंग से निपटारा नहीं होता और बड़ी संख्या में मामले आगे appeal या revision में आते हैं, तो इसका सीधा असर National Commission की पेंडेंसी पर पड़ सकता है।

NCDRC की bench composition पर पुराना विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?

2025 के कानूनी विश्लेषण में यह भी बताया गया था कि उचित bench composition की कमी से NCDRC के कुछ आदेशों की वैधता पर सवाल उठे हैं। विश्लेषण में राजस्थान हाईकोर्ट के Kamal Travels मामले और दिल्ली हाईकोर्ट के National Insurance Company v. Guljit Choudhary मामले का उल्लेख किया गया था, जहां उचित रूप से गठित बेंच के महत्व पर चर्चा हुई। इससे यह स्पष्ट होता है कि consumer justice में समस्या सिर्फ “कितने मामले लंबित हैं” का सवाल नहीं है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि मामलों की सुनवाई कौन कर रहा है, बेंच का गठन कानून के मुताबिक है या नहीं और क्या फैसला देने के लिए आवश्यक judicial तथा technical expertise मौजूद है।

सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्ट से आगे की दिशा तय हो सकती है

13 अगस्त की सुनवाई में मांगी गई रिपोर्ट के बाद अब अदालत के सामने देशभर के Consumer Commissions की वास्तविक स्थिति का एक विस्तृत picture आने की उम्मीद है। अगर रिपोर्ट से यह सामने आता है कि किसी विशेष राज्य या आयोग में अत्यधिक पेंडेंसी है, तो वहां अतिरिक्त benches या members की जरूरत पर विचार हो सकता है। वहीं कम पेंडेंसी वाले क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों के rationalisation का विकल्प भी सामने रह सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि रिपोर्ट से यह पता चले कि सबसे पुराने मामले कितने वर्षों से लंबित हैं और उन्हें खत्म करने के लिए कितना समय चाहिए।

उपभोक्ताओं के लिए क्यों अहम है यह मामला?

Consumer Court में जाने वाला आम नागरिक अक्सर किसी कंपनी, बैंक, बीमा कंपनी, बिल्डर, अस्पताल, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म या service provider के खिलाफ अपनी शिकायत लेकर पहुंचता है। ऐसे व्यक्ति के लिए वर्षों तक केवल अगली तारीख का इंतजार करना Consumer Protection व्यवस्था के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप सिर्फ अदालतों की administrative efficiency का मामला नहीं है, बल्कि सीधे consumer rights से जुड़ा मुद्दा है। अगर जिला स्तर पर गुणवत्तापूर्ण और समयबद्ध फैसला मिलता है, तो अनावश्यक appeals कम हो सकती हैं और State तथा National Commission पर भी बोझ घट सकता है।


 अब सुप्रीम कोर्ट की नजर सिर्फ आंकड़ों पर नहीं, व्यवस्था की गुणवत्ता पर

13 अगस्त 2026 की सुनवाई से यह संकेत साफ है कि सुप्रीम कोर्ट Consumer Commissions की समस्या को केवल “pending cases” के आंकड़े के रूप में नहीं देख रहा। अदालत जानना चाहती है कि देश के consumer forums में मामले क्यों अटक रहे हैं, सबसे पुराने मामलों की स्थिति क्या है, अलग-अलग benches कितने मामलों का निपटारा कर रही हैं और क्या मौजूदा manpower पर्याप्त है। इसके साथ ही जिला आयोगों में फैसलों की गुणवत्ता और NCDRC में bench composition तथा staffing से जुड़े पुराने सवाल इस बहस को और गंभीर बनाते हैं। अब NCDRC और State Commissions से मांगी गई रिपोर्ट यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि देश की consumer justice delivery system में केवल अतिरिक्त manpower की जरूरत है या फिर appointments, bench composition, infrastructure और case-management के स्तर पर व्यापक सुधार की आवश्यकता है।