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सरकारी योजनाओं में काम करने वाले DRDA कर्मचारियों को बड़ा झटका, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नियमितीकरण का दावा खारिज किया

सरकारी योजनाओं में सालों तक काम करने के बावजूद DRDA कर्मचारियों को सरकारी नौकरी के नियमितीकरण का लाभ नहीं मिलेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (DRDA) एक सोसायटी है, सरकारी विभाग नहीं, इसलिए वहां कार्यरत कर्मचारियों पर 2016 के नियमितीकरण नियम लागू नहीं होते।

Sonali01 सित. 2026, 02:06 PM IST
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सरकारी योजनाओं में काम करने वाले DRDA कर्मचारियों को बड़ा झटका, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नियमितीकरण का दावा खारिज किया

प्रयागराज।

 उत्तर प्रदेश में जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (District Rural Development Agency-DRDA) के तहत काम करने वाले कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि DRDA में कार्यरत कर्मचारी केवल इस आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार के 2016 के नियमितीकरण नियमों का लाभ नहीं मांग सकते कि वे सरकारी योजनाओं और परियोजनाओं के लिए काम कर रहे हैं। अदालत ने संबंधित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति अनिश कुमार गुप्ता ने कहा कि DRDA सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत एक सोसायटी है और यह केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं एवं परियोजनाओं के तहत कार्य करती है। ऐसे में DRDA में लगे कर्मचारियों को 2016 के नियमों के तहत नियमितीकरण का लाभ नहीं दिया जा सकता।


क्या था पूरा मामला?

यह मामला राजेंद्र कुमार और 33 अन्य याचिकाकर्ताओं से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं को अलग-अलग जिलों में DRDA द्वारा वर्ष 1986 से 2003 के बीच Data Entry Operator, Computer Operator और Programmer जैसे पदों पर नियुक्त किया गया था। उनका दावा था कि वे अपनी प्रारंभिक नियुक्ति के बाद लगातार काम करते रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2014 में हाईकोर्ट का रुख करते हुए Computer Programmer/Computer Operator के पद पर नियमितीकरण या समायोजन की मांग की थी। इसके साथ ही उन्होंने संबंधित पद के नियमित वेतनमान और अन्य सेवा लाभ देने की भी मांग की थी। वैकल्पिक रूप से उन्होंने DRDA में Statistical Assistant या Clerk के पद पर नियमित किए जाने की मांग की थी।


2016 के नियमों का क्यों नहीं मिला लाभ?

याचिकाकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश Regularisation of Persons Working on Daily Wages or on Work Charge or on Contract in Government Departments on Group 'C' and Group 'D' Posts Rules, 2016 का हवाला दिया था। लेकिन हाईकोर्ट ने नियमों के Rule 2(3) पर गौर किया। इस प्रावधान के अनुसार राज्य सरकार की योजनाओं या भारत सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों में consolidated pay या fixed honorarium पर लगाए गए व्यक्तियों पर ये नियम लागू नहीं होते। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति DRDA ने की थी। DRDA एक अलग सोसायटी है और केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत कार्य करती है। इसलिए 2016 के नियमों के तहत उन्हें नियमितीकरण का लाभ नहीं दिया जा सकता।


सरकारी आदेश भी नहीं आया काम

याचिकाकर्ताओं ने 13 अगस्त 2015 और 9 दिसंबर 2021 के सरकारी आदेशों का भी सहारा लिया था। कोर्ट ने पाया कि 13 अगस्त 2015 का सरकारी आदेश सरकारी विभागों, स्वायत्त निकायों, सार्वजनिक उपक्रमों, निगमों, स्थानीय निकायों, विकास प्राधिकरणों और जिला पंचायतों आदि से संबंधित है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश DRDA पर लागू नहीं होता, क्योंकि DRDA सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत गठित अलग संस्था है। इसलिए इन सरकारी आदेशों के आधार पर भी याचिकाकर्ताओं को नियमितीकरण का अधिकार नहीं मिल सकता।


पुराने आदेशों को चुनौती देने से भी इनकार

याचिकाकर्ताओं ने 3 फरवरी 2009 और 20 मई 2010 के उन आदेशों को भी रद्द करने की मांग की थी, जिनमें समान स्थिति वाले कर्मचारियों के दावों को खारिज किया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता उन कार्यवाहियों के पक्षकार नहीं थे। इसलिए वे उन आदेशों को अपनी याचिका के जरिए रद्द कराने की मांग नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि जिन व्यक्तियों के दावे खारिज हुए थे, उनके पास संबंधित आदेशों को चुनौती देने का अधिकार हो सकता है, लेकिन वर्तमान याचिकाकर्ता उनकी ओर से ऐसा नहीं कर सकते।


कोर्ट ने याचिका की खारिज

इन सभी तथ्यों और लागू नियमों पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति अनिश कुमार गुप्ता ने याचिका खारिज कर दी। इस फैसले का सीधा मतलब है कि DRDA में काम करने वाले कर्मचारियों को केवल सरकारी योजनाओं में काम करने के आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार के 2016 के नियमितीकरण नियमों का स्वतः लाभ नहीं मिल सकता।