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सोशल मीडिया की कीमत: बढ़ता अकेलापन, घटते रिश्ते और बढ़ता मुनाफा

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दुनिया को पहले से कहीं अधिक जोड़ दिया है, लेकिन इसके समानांतर एक चिंताजनक सच्चाई भी तेजी से सामने आ रही है। डिजिटल कनेक्टिविटी के इस दौर में लोग पहले से अधिक अकेलेपन, मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव का सामना कर रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अकेलापन अब केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रह गया, बल्कि यह वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है।

Vindhya Dubey06 अग. 2026, 06:37 PM IST
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सोशल मीडिया की कीमत: बढ़ता अकेलापन, घटते रिश्ते और बढ़ता मुनाफा

ऑस्ट्रेलिया के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पॉल डेली का कहना है कि टेक कंपनियां लोगों के समय, ध्यान और मानसिक व्यवहार को अपने मुनाफे का साधन बना चुकी हैं। उनका मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे एल्गोरिदम पर काम करते हैं, जिनका उद्देश्य लोगों को अधिक से अधिक समय तक स्क्रीन से जोड़े रखना है। परिणामस्वरूप, लोग यह जानते हुए भी कि सोशल मीडिया उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है, उससे दूरी नहीं बना पाते।

युवाओं पर सबसे अधिक असर

पॉल डेली के अनुसार, 25 वर्ष तक की युवा पीढ़ी इस डिजिटल निर्भरता की सबसे बड़ी शिकार है। यह पीढ़ी ऐसे दौर में बड़ी हुई है, जहां लगातार ऑनलाइन रहना सामान्य जीवन का हिस्सा बन चुका है। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने का दबाव, लाइक्स और फॉलोअर्स की प्रतिस्पर्धा तथा हर समय उपलब्ध रहने की मानसिकता युवाओं में तनाव और अकेलेपन को बढ़ा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, औसतन एक व्यक्ति प्रतिदिन करीब 2 घंटे 23 मिनट सोशल मीडिया स्क्रॉल करने में बिताता है। यदि इसे पूरे जीवनकाल में जोड़ा जाए तो लगभग 5 से 6 वर्ष केवल सोशल मीडिया पर ही खर्च हो जाते हैं।

तीन घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम बढ़ा रहा मानसिक बीमारियों का खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिदिन तीन घंटे से अधिक सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले किशोरों में अवसाद और चिंता जैसी मानसिक समस्याओं का खतरा लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से नींद प्रभावित होती है, आत्मविश्वास में कमी आती है और वास्तविक सामाजिक संबंध कमजोर पड़ने लगते हैं।

सिर्फ युवा ही नहीं, हर उम्र के लोग प्रभावित

पॉल डेली इस धारणा को भी गलत बताते हैं कि अकेलेपन की समस्या केवल युवाओं तक सीमित है। उनका कहना है कि उन्होंने अपने जीवन के दो दशक किताबों और लेखन के बीच अपेक्षाकृत अकेले बिताए, लेकिन वास्तविक अकेलापन उन्हें तब महसूस हुआ जब वे सोशल मीडिया से जुड़े। उनका अनुभव बताता है कि डिजिटल दुनिया में सक्रिय रहने के बावजूद व्यक्ति भावनात्मक रूप से पहले से अधिक अलग-थलग महसूस कर सकता है।

डोपामाइन का खेल: क्यों नहीं छूटती सोशल मीडिया की आदत

न्यूरोसाइंस के विशेषज्ञ बताते हैं कि सोशल मीडिया पर मिलने वाले नोटिफिकेशन, लाइक्स और कमेंट्स दिमाग में डोपामाइन हार्मोन का स्राव बढ़ाते हैं। यही हार्मोन जुए या नशीले पदार्थों की लत के दौरान भी सक्रिय होता है। बार-बार मिलने वाला यह "रिवॉर्ड" लोगों को बार-बार फोन देखने और लगातार स्क्रॉल करते रहने के लिए प्रेरित करता है। इसी कारण 70 प्रतिशत से अधिक युवा 'फोमो' यानी "फियर ऑफ मिसिंग आउट" का शिकार हो जाते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं वे किसी नई जानकारी, ट्रेंड या सामाजिक गतिविधि से पीछे न रह जाएं। यही वजह है कि कई युवा देर रात तक मोबाइल स्क्रीन से चिपके रहते हैं, जिससे उनकी नींद, पढ़ाई, कार्यक्षमता और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

एल्गोरिदम का लक्ष्य: ज्यादा समय, ज्यादा कमाई

विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे एल्गोरिदम का उपयोग करते हैं, जो उपयोगकर्ता की पसंद, व्यवहार और रुचियों के आधार पर लगातार नया कंटेंट दिखाते रहते हैं। इसका उद्देश्य उपयोगकर्ता का स्क्रीन टाइम बढ़ाना होता है, क्योंकि जितना अधिक समय लोग प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं, उतना अधिक विज्ञापन राजस्व कंपनियों को मिलता है। आलोचकों का कहना है कि इस मॉडल में उपयोगकर्ता का मानसिक स्वास्थ्य अक्सर व्यावसायिक हितों के पीछे छूट जाता है। धीरे-धीरे लोग वास्तविक सामाजिक संबंधों से दूर होकर डिजिटल दुनिया में अधिक समय बिताने लगते हैं, जिससे अकेलेपन की भावना और गहरी हो जाती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ सोशल मीडिया के संतुलित उपयोग की सलाह देते हैं। वे स्क्रीन टाइम सीमित करने, परिवार और मित्रों के साथ प्रत्यक्ष संवाद बढ़ाने, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और डिजिटल डिटॉक्स जैसी आदतें अपनाने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि तकनीक का उपयोग जीवन को आसान बनाने के लिए होना चाहिए, न कि उसे मानसिक रूप से बोझिल बनाने के लिए।