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PIL में पुरानी मुकदमेबाजी छिपाना पड़ा भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर लगाया ₹2 लाख जुर्माना
जनहित याचिका (PIL) को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए साफ कर दिया कि अदालत से तथ्यों को छिपाकर न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बरेली के नगर निगम स्लॉटर हाउस से जुड़े 2015 के टेंडर को चुनौती देने वाली PIL में याचिकाकर्ता द्वारा पिछली मुकदमेबाजी का खुलासा न करने और कथित तौर पर गलत घोषणा करने पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की पीठ ने इसे कानून की प्रक्रिया का “घोर दुरुपयोग” बताते हुए याचिकाकर्ता पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया।

प्रयागराज।
जनहित याचिका (PIL) को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए एक याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने इसी मामले से जुड़ी पिछली न्यायिक कार्यवाहियों की जानकारी छिपाई और यह घोषणा भी की कि विषय से संबंधित पहले कोई PIL या रिट याचिका दाखिल नहीं हुई है। कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग मानते हुए याचिकाकर्ता पर ₹2 लाख का हर्जाना लगाया है। मामला बरेली के मोहनपुर थिरिया स्थित नगर निगम के स्लॉटर हाउस के संचालन के लिए वर्ष 2015 में दिए गए टेंडर से जुड़ा था। याचिकाकर्ता शैलेश सिंह ने खुद को जनहित के लिए काम करने वाला नागरिक, इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट और ‘राष्ट्रीय समस्या’ का संपादक बताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
क्या थी याचिका?
याचिकाकर्ता ने 11 दिसंबर 2015 को जारी उस पत्र को रद्द करने की मांग की थी, जिसके जरिए Marya Frozen Agro Food Products Pvt. Ltd. को बरेली के मोहनपुर थिरिया स्थित नगर निगम के स्लॉटर हाउस के संचालन का टेंडर मंजूर किया गया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि टेंडर प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 300-A के विपरीत है और इसमें कथित तौर पर धोखाधड़ी, मिलीभगत तथा प्रक्रिया के दुरुपयोग जैसे तत्व शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से नए सिरे से टेंडर जारी करने और बोली लगाने वाली कंपनियों के incorporation, directors तथा beneficial ownership की जांच कराने की मांग भी की थी।
कोर्ट के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या बनी?
सुनवाई के दौरान सामने आया कि इसी स्लॉटर हाउस और संबंधित कंपनी को लेकर पहले भी कई कानूनी कार्यवाहियां हो चुकी थीं। इसके बावजूद मौजूदा PIL में उन कार्यवाहियों का पूरा खुलासा नहीं किया गया। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शैलेश सिंह पहले भी संबंधित पर्यावरणीय विवादों में अदालत और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष सामने आ चुके थे। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, 2024 में भी शैलेश सिंह ने Marya Frozen Agro Food Products के स्लॉटर हाउस के कथित पर्यावरणीय उल्लंघनों को लेकर PIL में हस्तक्षेप की कोशिश की थी। उस समय हाईकोर्ट ने उन्हें अपनी impleadment application को PIL में बदलने की अनुमति नहीं दी थी और कहा था कि वे उचित शोध के बाद अलग से PIL दाखिल कर सकते हैं अथवा कानून के अनुसार NGT का रुख कर सकते हैं।
2024 में भी उठा था स्लॉटर हाउस के पर्यावरणीय उल्लंघन का मुद्दा
रिकॉर्ड के अनुसार, जुलाई 2024 में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) ने पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के आरोपों के आधार पर स्लॉटर हाउस के खिलाफ क्लोजर ऑर्डर जारी किया था। 4 जुलाई 2024 के क्लोजर ऑर्डर को कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। 11 जुलाई 2024 को हाईकोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के आधार पर उस आदेश को रद्द कर दिया। इसके बाद UPPCB ने 15 जुलाई 2024 को फिर कार्रवाई की। बाद में यह आदेश भी चुनौती के दायरे में आया और 2 सितंबर 2024 को UPPCB ने उसे वापस ले लिया। इसके चलते संबंधित रिट याचिका 4 सितंबर 2024 को निष्प्रभावी मानकर निस्तारित कर दी गई। इसी कार्यवाही के दौरान शैलेश सिंह ने हस्तक्षेप आवेदन दाखिल किया था और उसे PIL में बदलने का अनुरोध किया था, लेकिन हाईकोर्ट ने ऐसा करने से इनकार किया था।
NGT तक भी पहुंचा था मामला
स्लॉटर हाउस के कथित पर्यावरणीय उल्लंघनों को लेकर शैलेश सिंह की ओर से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में भी कार्यवाही हुई। इसमें आरोप लगाया गया था कि स्लॉटर हाउस अनुमत सीमा से अधिक पशुओं का वध कर रहा है और बिना उचित उपचार के अपशिष्ट छोड़े जाने समेत पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन हो रहा है। रिकॉर्ड में यह भी सामने आता है कि UPPCB ने वर्ष 2019 में सशर्त सहमति के तहत प्रतिदिन 300 भैंसों के वध की अनुमति दी थी और बाद में यह सहमति 31 दिसंबर 2026 तक नवीनीकृत की गई थी। 2026 में भी शैलेश सिंह की ओर से इसी इकाई के कथित पर्यावरणीय उल्लंघनों को लेकर NGT में मामला सामने आया। NGT के रिकॉर्ड में अवैध रूप से अधिक वध, untreated effluent और Zero Liquid Discharge (ZLD) की शर्तों के पालन न होने जैसे आरोप दर्ज हैं।
हाईकोर्ट ने PIL को क्यों माना ‘दुरुपयोग’?
मौजूदा PIL पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की पीठ ने कहा कि PIL दाखिल करने वाला व्यक्ति कोर्ट से पूर्ण, सही और पारदर्शी तथ्यों के साथ संपर्क करे। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने पहले की कार्यवाहियों को छिपाया और यह गलत घोषणा की कि इसी विषय पर पहले कोई PIL या रिट याचिका दाखिल नहीं हुई है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन सिद्धांतों का भी सहारा लिया जिनमें कहा गया है कि PIL के जरिए निजी विवाद, प्रचार या किसी अप्रत्यक्ष उद्देश्य को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं की जा सकती। अदालत ने ‘Prestige Lights Ltd. v. State Bank of India’ के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि रिट क्षेत्राधिकार मांगने वाला पक्ष सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करने के लिए बाध्य है।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा याचिका “gross misuse and abuse of process of law” है और ऐसी PIL को भारी लागत के साथ खारिज किया जाना चाहिए ताकि PIL की आड़ में निहित स्वार्थ के लिए रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने वालों के लिए एक निवारक संदेश जाए।
₹2 लाख की लागत, एक महीने में जमा करना होगा
कोर्ट ने PIL को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹2 लाख की लागत लगाई है। यह रकम हाईकोर्ट की Legal Services Committee में एक महीने के भीतर जमा करनी होगी। यदि राशि निर्धारित समय में जमा नहीं की जाती है तो संबंधित प्रतिवादी Registrar General के समक्ष कार्रवाई के लिए जा सकता है। इसके बाद रकम को बरेली के कलेक्टर के माध्यम से भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूल किया जा सकता है।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण?
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि PIL महज किसी भी विवाद को कोर्ट तक ले जाने का माध्यम नहीं है। जनहित याचिका दाखिल करने वाले व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अदालत के सामने पूरे तथ्य रखे और पहले हुई मुकदमेबाजी को न छिपाए। इस मामले में कोर्ट की सख्ती का सीधा संदेश है कि यदि कोई व्यक्ति पुराने मामलों और महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर PIL दाखिल करता है, तो उसे न केवल याचिका खारिज होने का सामना करना पड़ सकता है बल्कि भारी आर्थिक लागत भी लगाई जा सकती है।
