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अपराध मामलों में मेडिकल-फॉरेंसिक रिकॉर्ड तक कोर्ट की सीधी पहुंच, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा कदम; MedLEaPR-CCTNS-ICJS को जोड़ने पर जोर

अपराध की जांच में मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट अक्सर सबसे अहम कड़ियों में होती हैं, लेकिन जब यही रिकॉर्ड अलग-अलग विभागों और डिजिटल सिस्टम में बंटे हों तो न्याय की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। अब इसी समस्या को दूर करने की दिशा में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने NIC को निर्देश दिया है कि संबंधित कोर्ट और मजिस्ट्रेट को MedLEaPR और E-Forensic Laboratory के डेटा तक सीधे पहुंच उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाए। यानी पोस्टमार्टम रिपोर्ट से लेकर मेडिकल और फॉरेंसिक रिकॉर्ड तक, जांच से जुड़े अहम दस्तावेज अदालत तक डिजिटल तरीके से ज्यादा आसानी से पहुंच सकेंगे। हाईकोर्ट की यह पहल यूपी की आपराधिक न्याय व्यवस्था को Police-Court-Health-Forensic के एक मजबूत डिजिटल नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

Sonali26 अग. 2026, 01:50 PM IST
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अपराध मामलों में मेडिकल-फॉरेंसिक रिकॉर्ड तक कोर्ट की सीधी पहुंच, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा कदम; MedLEaPR-CCTNS-ICJS को जोड़ने पर जोर

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा डिजिटल आदेश

आपराधिक मामलों में जांच से जुड़े मेडिकल और फॉरेंसिक रिकॉर्ड अब अदालतों तक ज्यादा तेजी और सीधे डिजिटल माध्यम से पहुंचाने की तैयारी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने National Informatics Centre (NIC) को निर्देश दिया है कि संबंधित Court या Magistrate को MedLEaPR और E-Forensic Laboratory में उपलब्ध डेटा तक सीधे पहुंच दिलाने की व्यवस्था की जाए। यह निर्देश जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने 19 अगस्त 2026 के आदेश में दिया। कोर्ट ने MedLEaPR, CCTNS, ICJS और E-Forensic Laboratory जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को आपस में जोड़ने की दिशा में हुई प्रगति को रिकॉर्ड किया और उत्तर प्रदेश में इस integration को प्रभावी बनाने के लिए स्वास्थ्य विभाग तथा पुलिस प्रशासन को NIC के साथ सहयोग करने को कहा। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आपराधिक मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट, चोटों की मेडिकल रिपोर्ट, अन्य मेडिको-लीगल दस्तावेज और फॉरेंसिक रिपोर्ट कई बार जांच और मुकदमे के महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं। डिजिटल integration का उद्देश्य इन रिकॉर्ड को अलग-अलग विभागों में पड़े रहने के बजाय अधिक व्यवस्थित तरीके से संबंधित न्यायालय तक पहुंचाना है।

एक जमानत केस से शुरू हुई डिजिटल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की पड़ताल

यह मामला Aatish Alias Krishnkant v. State of U.P. से जुड़ा है। शुरुआत में यह एक Dowry Death आरोपी की bail plea थी, लेकिन सुनवाई के दौरान कोर्ट का ध्यान उत्तर प्रदेश में आपराधिक जांच से जुड़े अलग-अलग डिजिटल सिस्टम के बीच data sharing और integration की स्थिति पर गया। कोर्ट ने आरोपी को जमानत दी, लेकिन मामले को पूरी तरह खत्म करने के बजाय डिजिटल integration से जुड़े पहलुओं की प्रगति पर नजर बनाए रखी। 19 अगस्त के आदेश में कोर्ट ने इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए संबंधित अदालत को मेडिकल और फॉरेंसिक डेटा तक direct access उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाया। इसलिए इस मामले का महत्व केवल आरोपी की जमानत तक सीमित नहीं है। यह उत्तर प्रदेश में police investigation, medical records, forensic evidence और court proceedings को डिजिटल रूप से जोड़ने की व्यापक प्रक्रिया का उदाहरण बन गया है।

MedLEaPR क्या है और इसमें कौन-कौन से रिकॉर्ड होते हैं?

MedLEaPR यानी Medico Legal Examination and Post Mortem Reporting System, NIC द्वारा विकसित एक centralized digital platform है। इसका उद्देश्य मेडिको-लीगल रिपोर्टिंग को डिजिटल और standardized बनाना है। NIC के अनुसार इस सिस्टम में Injury MLR, Age Estimation, Sexual Assault Victim/Accused से संबंधित MLR, Adult Post-Mortem Report, Foetus Post-Mortem Report और Death Summary जैसी रिपोर्टों को डिजिटल रूप से तैयार और submit किया जा सकता है। इसमें doctors, forensic experts और investigating officers के लिए role-based access की व्यवस्था है। इस platform का एक महत्वपूर्ण हिस्सा CCTNS integration है। NIC के मुताबिक MedLEaPR को CCTNS के साथ integrate किया गया है, जिससे अधिकृत जांच अधिकारियों तक संबंधित medico-legal information पहुंचाई जा सकती है। NIC की उपलब्ध जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में 15 हजार से अधिक post-mortem reports MedLEaPR पर upload की जा चुकी हैं और संबंधित State CCTNS Police Portal के साथ साझा की गई हैं।

CCTNS से जुड़ने के बाद पुलिस को क्या फायदा?

CCTNS यानी Crime and Criminal Tracking Network & Systems पुलिस के crime और investigation records का digital platform है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रिकॉर्ड किया कि MedLEaPR अब CCTNS से integrated है। इससे अस्पतालों द्वारा upload की गई post-mortem और अन्य medical reports पुलिस अधिकारियों को अपने digital investigation system के जरिए उपलब्ध हो सकती हैं। इसका सीधा फायदा यह है कि मेडिकल रिकॉर्ड को केवल physical file या अलग विभागीय communication के जरिए हासिल करने की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि, कोर्ट तक direct access का अगला चरण अलग है। 19 अगस्त के आदेश में NIC को संबंधित Court/Magistrate के लिए MedLEaPR और E-Forensic Laboratory data की direct access व्यवस्था करने को कहा गया है। यानी यह कहना अधिक सटीक होगा कि अदालतों के लिए ऐसी व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया गया है, न कि यह कि प्रत्येक अदालत को उसी दिन से सभी रिकॉर्ड की unrestricted access मिल गई।

ICJS बनेगा अलग-अलग सिस्टम के बीच पुल

ICJS यानी Inter-operable Criminal Justice System इस पूरी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य criminal justice system के अलग-अलग components के बीच information sharing को सक्षम बनाना है। MeitY की हालिया सामग्री के अनुसार ICJS, CCTNS, e-Courts, e-Prisons, e-Forensics, e-Prosecution, Fingerprint, MedLEaPR और अन्य संबंधित systems के बीच data exchange की सुविधा देता है। इसका architecture “One Data, One Entry” के सिद्धांत पर आधारित है, ताकि एक जगह दर्ज जानकारी को दूसरे systems में दोबारा manually enter करने की जरूरत कम हो। यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश केवल मेडिकल रिपोर्ट की access का आदेश नहीं है। इसके पीछे criminal investigation और judicial process के विभिन्न digital pillars को जोड़ने की बड़ी व्यवस्था है।

कोर्ट ने NIC और UP अधिकारियों से क्या कहा?

हाईकोर्ट ने NIC को निर्देश दिया कि concerned Court/Magistrate को MedLEaPR और E-Forensic Laboratory में उपलब्ध डेटा तक direct access देने की व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार के Principal Secretary, Health और Director General of Police को NIC के साथ सहयोग करने को कहा गया, ताकि ICJS का implementation प्रभावी तरीके से किया जा सके और मेडिकल तथा forensic data संबंधित कोर्ट तक उपलब्ध हो सके।

केस डायरी और Final Police Report भी डिजिटल रूप से उपलब्ध

सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि concerned Magistrate के लिए CIS पर पूरी case diary और final police report उपलब्ध है। इसके लिए CIS के साथ API share की गई है, जिसके जरिए Magistrate case diary और final police report access कर सकता है। कोर्ट ने यह भी रिकॉर्ड किया कि chargesheet के Circle Officer द्वारा verification के लिए एक feature आगे जोड़ा जाना है। इसका अर्थ है कि digital integration केवल medical और forensic records तक सीमित नहीं है। Police investigation से जुड़े महत्वपूर्ण documents भी court-facing digital system में उपलब्ध कराने की दिशा में काम हो रहा है।

इसी केस में Section 180 BNSS को लेकर भी उठा था बड़ा सवाल

Aatish Alias Krishnkant मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। इसी मामले की कार्यवाही के दौरान पुलिस द्वारा witnesses के statements रिकॉर्ड करने के तरीके को लेकर भी कोर्ट ने चिंता जताई थी। हाईकोर्ट ने Section 180 BNSS के तहत statements record करने की प्रक्रिया को लेकर पुलिस को निर्देश दिए थे कि witness के बयान में पुलिस अपनी ओर से ऐसी सामग्री न डाले जो witness के वास्तविक version से अलग हो। बयान को गवाह की अपनी भाषा और उसके वास्तविक कथन के अनुरूप रिकॉर्ड करने पर जोर दिया गया था। इससे यह मामला केवल digitalisation का नहीं बल्कि investigation की quality और procedural fairness से जुड़े व्यापक सवालों से भी जुड़ जाता है।

मेडिकल रिकॉर्ड से लेकर फॉरेंसिक रिपोर्ट तक क्यों जरूरी है यह बदलाव?

किसी हत्या, दहेज मृत्यु, यौन अपराध, मारपीट, poisoning या अन्य गंभीर आपराधिक मामले में मेडिकल और फॉरेंसिक evidence investigation की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पुरानी व्यवस्था में अलग-अलग विभागों के रिकॉर्ड को अदालत तक पहुंचाने में paperwork, communication और manual transfer जैसी प्रक्रियाएं शामिल हो सकती थीं। Digital integration से authorized users को रिकॉर्ड अधिक तेजी से उपलब्ध कराने और information flow को trackable बनाने में मदद मिल सकती है। NIC के मुताबिक MedLEaPR digitally signed और standardized documentation, audit trails, role-based access और police-health coordination जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसका एक और फायदा यह हो सकता है कि handwritten medico-legal reports से जुड़ी illegibility और manual errors जैसी समस्याएं कम हों। NIC ने भी medico-legal reports के traditional handwritten format को judicial proceedings के लिए चुनौतीपूर्ण बताया है।

फॉरेंसिक डेटा के लिए E-Forensic Laboratory का महत्व

अपराध की जांच में केवल मेडिकल रिपोर्ट ही पर्याप्त नहीं होती। कई मामलों में forensic examination भी महत्वपूर्ण होती है। इसी वजह से हाईकोर्ट ने E-Forensic Laboratory data को भी Court/Magistrate की direct access व्यवस्था में शामिल किया है। ICJS के broader framework में e-Forensics criminal justice system के प्रमुख digital components में शामिल है। MeitY ने इसे CCTNS, e-Courts, e-Prisons, e-Prosecution और MedLEaPR जैसे platforms के साथ integrated architecture का हिस्सा बताया है। इस integration से भविष्य में अदालतों को investigation के विभिन्न digital sources से information एक connected ecosystem में उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

हिंदी में Summons और Warrants की भी तैयारी

हाईकोर्ट ने digital criminal justice process के दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में CIS के जरिए Hindi में summons और warrants generate करने की संभावना तलाशने का निर्देश दिया। इसके अलावा NIC को electronic verification of sureties से संबंधित हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए भी कहा गया। यानी कोर्ट की चिंता सिर्फ “medical report online करने” तक सीमित नहीं है। पूरी criminal justice process को ज्यादा digital और interoperable बनाने की दिशा में काम हो रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी चल रहा है Digital Criminal Justice का विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश एक बड़े राष्ट्रीय digital justice framework से जुड़ता है। MeitY के अनुसार ICJS का उद्देश्य criminal justice ecosystem के विभिन्न databases को जोड़कर data duplication कम करना और decision-making को तेज करना है। इसके ecosystem में police के लिए CCTNS, courts के लिए e-Courts/CIS, prisons के लिए e-Prisons, prosecution के लिए e-Prosecution, forensic laboratories के लिए e-Forensics और medico-legal records के लिए MedLEaPR शामिल हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश में कोर्ट द्वारा direct access की दिशा में उठाया गया कदम राष्ट्रीय ICJS architecture के implementation को जमीनी स्तर पर मजबूत करने वाला कदम माना जा सकता है।

लेकिन Direct Digital Access का मतलब क्या है?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी और तकनीकी अंतर समझना जरूरी है। हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि हर अदालत को सभी मेडिकल और फॉरेंसिक रिकॉर्ड की बिना किसी restriction के access होगी। आदेश का उद्देश्य संबंधित Court/Magistrate के लिए authorized direct access की व्यवस्था करना है। MedLEaPR खुद role-based access और secure authentication जैसी व्यवस्था पर आधारित है। इसलिए data privacy, authentication और authorized access की व्यवस्था इस digital integration का अहम हिस्सा बनी रहेगी।

हाईकोर्ट के आदेश का बड़ा असर क्या हो सकता है?

अगर यह व्यवस्था पूरी तरह और सुरक्षित तरीके से लागू होती है तो आपराधिक मामलों में Court, Police, Health Department और Forensic Laboratory के बीच information flow ज्यादा seamless हो सकता है।सबसे महत्वपूर्ण संभावित बदलाव यह होगा कि किसी मामले में अदालत को जरूरी medical या forensic record हासिल करने के लिए हर बार अलग-अलग विभागीय प्रक्रिया पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इससे record availability और case management बेहतर हो सकता है। हालांकि, किसी digital record की उपलब्धता अपने आप उसकी evidentiary value तय नहीं करती। किसी रिपोर्ट की admissibility, authenticity और probative value का निर्धारण संबंधित कानून और मामले के facts के आधार पर न्यायालय करेगा।

एक जमानत केस से शुरू हुई पड़ताल, अब पूरी डिजिटल क्रिमिनल जस्टिस व्यवस्था तक

Aatish Alias Krishnkant केस की सबसे अहम बात यही है कि एक सामान्य bail proceeding के दौरान उठे procedural और technological सवाल अब व्यापक judicial reform से जुड़ गए हैं। गवाहों के बयान कैसे रिकॉर्ड हों, medical और post-mortem reports पुलिस तक कैसे पहुंचें, forensic data अदालत तक कैसे जाए, case diary और final police report Magistrate को डिजिटल रूप से कैसे उपलब्ध हो और summons/warrants को स्थानीय भाषा में कैसे generate किया जाए—इन सभी पहलुओं को एक interconnected digital criminal justice system के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। 19 अगस्त का आदेश इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण अगला कदम है।