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एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026: विदेशी फंडिंग पर सख्ती की तैयारी, अमेरिकी सांसदों ने जताई चिंता

भारत सरकार एफसीआरए कानून में संशोधन कर विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित विधेयक में एफसीआरए पंजीकरण रद्द होने पर विदेशी फंड और संपत्तियों के प्रबंधन के लिए नामित प्राधिकरण बनाने का प्रावधान शामिल है। इस प्रस्ताव को लेकर अमेरिका के कुछ सांसदों ने चिंता जताई है, जबकि सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य केवल वित्तीय निगरानी और पारदर्शिता को मजबूत करना है।

Anshuman Mishra06 अग. 2026, 04:26 PM IST
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एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026: विदेशी फंडिंग पर सख्ती की तैयारी, अमेरिकी सांसदों ने जताई चिंता

नई दिल्ली/वॉशिंगटन: भारत सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए (Foreign Contribution Regulation Act) में व्यापक संशोधन की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाना है। सरकार का मानना है कि इससे विदेशी धन के उपयोग पर बेहतर निगरानी रखी जा सकेगी और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में त्वरित कार्रवाई संभव होगी। हालांकि इस प्रस्तावित विधेयक को लेकर अमेरिका के कुछ सांसदों ने चिंता जताई है और इसे भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण बताया है।


रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सांसद रिले मूर और रिच मैककॉर्मिक ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि यदि विधेयक वर्तमान स्वरूप में पारित होता है तो इसका प्रभाव भारत में विदेशी सहायता प्राप्त चर्चों, धार्मिक संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) पर पड़ सकता है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि इससे इन संस्थाओं की प्रशासनिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। हालांकि यह बयान अमेरिकी सांसदों की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है, इसे अमेरिकी सरकार की आधिकारिक नीति नहीं माना जाता।


क्या है एफसीआरए?

एफसीआरए भारत का वह कानून है, जो विदेशी स्रोतों से मिलने वाले आर्थिक योगदान को नियंत्रित करता है। इस कानून के तहत कोई भी गैर-सरकारी संगठन, ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्था, सामाजिक संगठन या धार्मिक संस्था विदेश से धन तभी प्राप्त कर सकती है, जब उसके पास गृह मंत्रालय द्वारा जारी वैध एफसीआरए पंजीकरण या पूर्व अनुमति हो। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक हित और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप हो।


प्रस्तावित संशोधन में क्या बदलाव होंगे?

प्रस्तावित संशोधन के अनुसार यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है, समाप्त हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो केंद्र सरकार एक नामित प्राधिकरण (Designated Authority) नियुक्त कर सकेगी। यह प्राधिकरण संस्था के विदेशी फंड और उससे निर्मित परिसंपत्तियों का प्रबंधन करेगा, ताकि उनका दुरुपयोग न हो और सार्वजनिक हित सुरक्षित रहे। इसके अलावा विदेशी चंदे के उपयोग, वित्तीय रिपोर्टिंग, संपत्ति प्रबंधन और अनुपालन (Compliance) से जुड़े नियमों को भी अधिक स्पष्ट और सख्त बनाया जा सकता है। सरकार का मानना है कि इससे वित्तीय पारदर्शिता बढ़ेगी और विदेशी धन के दुरुपयोग की संभावना कम होगी।


सरकार की मंशा क्या है?

सरकार का कहना है कि भारत में बड़ी संख्या में सामाजिक, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाएं विदेशी सहायता प्राप्त करती हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि प्रत्येक रुपये का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए हो और उसकी निगरानी प्रभावी तरीके से की जा सके। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य किसी संस्था या समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि पूरे विदेशी फंडिंग तंत्र को अधिक जवाबदेह बनाना है।


विरोध क्यों हो रहा है?

कुछ सामाजिक संगठनों, मानवाधिकार समूहों और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि प्रस्तावित संशोधन सरकार को अधिक प्रशासनिक अधिकार देगा, जिससे गैर-सरकारी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। अमेरिकी सांसदों ने भी इसी आधार पर चिंता व्यक्त की है। हालांकि भारत सरकार का कहना है कि विधेयक का मकसद केवल नियामकीय व्यवस्था को मजबूत करना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।


भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या असर पड़ सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में विदेशी फंडिंग से जुड़े कानूनों में बदलाव घरेलू नीति का विषय होता है। हालांकि यदि इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आती हैं, तो यह भारत-अमेरिका के बीच कूटनीतिक चर्चा का विषय बन सकता है। फिर भी दोनों देशों के संबंध रक्षा, व्यापार, तकनीक और रणनीतिक सहयोग जैसे कई व्यापक क्षेत्रों पर आधारित हैं, इसलिए किसी एक विधेयक से संबंधों पर तत्काल बड़ा प्रभाव पड़ने की संभावना सीमित मानी जाती है।


यह संशोधन क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में हजारों एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाएं विदेशी अनुदान के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, आपदा राहत, अनुसंधान और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में काम करती हैं। ऐसे में एफसीआरए कानून में कोई भी बदलाव इन संस्थाओं की वित्तीय व्यवस्था, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और अनुपालन प्रणाली को सीधे प्रभावित करेगा। यदि नया कानून लागू होता है तो विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं को दस्तावेजीकरण, ऑडिट, वित्तीय रिपोर्टिंग और नियामकीय अनुपालन को और अधिक मजबूत करना होगा। वहीं सरकार के पास विदेशी धन के उपयोग की निगरानी और अनियमितताओं पर कार्रवाई के अधिक प्रभावी अधिकार होंगे। अंतिम निर्णय संसद में विधेयक पर चर्चा, संशोधनों और पारित होने के बाद ही स्पष्ट होगा। इसलिए वर्तमान समय में इसे एक प्रस्तावित सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसके अंतिम स्वरूप के आधार पर ही इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन किया जा सकेगा।