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ऑर्गन ट्रांसप्लांट में भारत आगे, फिर भी 89,839 मरीज इंतजार में

भारत ने पिछले एक दशक में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश में प्रत्यारोपण करने वाले अस्पतालों, विशेषज्ञ डॉक्टरों, अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और अंग प्रत्यारोपण से जुड़े संस्थागत नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013 में भारत में जहां करीब 4,990 अंग प्रत्यारोपण हुए थे, वहीं 2023 में यह संख्या बढ़कर 18,378 और 2024 में करीब 18,900 के स्तर तक पहुंच गई। यानी एक दशक के भीतर वार्षिक अंग प्रत्यारोपण की संख्या लगभग चार गुना हो गई।

Vindhya Dubey13 अग. 2026, 09:43 PM IST
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ऑर्गन ट्रांसप्लांट में भारत आगे, फिर भी 89,839 मरीज इंतजार में

लेकिन इस उपलब्धि की दूसरी तस्वीर कहीं अधिक गंभीर है। प्रत्यारोपण की क्षमता बढ़ने के बावजूद जरूरतमंद मरीजों के लिए उपलब्ध अंगों की संख्या अभी भी बहुत कम है। बड़ी संख्या में मरीज किडनी, लिवर, हृदय, फेफड़े और अन्य अंगों के लिए प्रतीक्षा सूची में हैं। खासतौर पर मृतक अंगदान यानी मृत व्यक्ति से प्राप्त अंगों की उपलब्धता भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में बनी हुई है। राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन यानी NOTTO के अनुसार भारत कुल अंग प्रत्यारोपण की संख्या के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है, जबकि जीवित दाताओं से होने वाले प्रत्यारोपण में भारत दुनिया में अग्रणी देशों में शामिल है। इसके बावजूद भारत में मृतक अंगदान की दर प्रति 10 लाख आबादी पर एक से भी कम बनी हुई है। यही भारत के अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम का सबसे बड़ा विरोधाभास है। देश में अत्याधुनिक अस्पतालों और सर्जिकल क्षमता का विस्तार हो रहा है, लेकिन जरूरत के अनुपात में अंग उपलब्ध नहीं हैं।

एक दशक में लगभग चार गुना बढ़े प्रत्यारोपण

भारत में अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम की गति पिछले वर्षों में काफी तेज हुई है। 2013 में देश में कुल 4,990 अंग प्रत्यारोपण हुए थे। इसके बाद प्रत्यारोपण की संख्या लगातार बढ़ी और 2023 में यह 18,378 तक पहुंच गई। 2024 में यह संख्या करीब 18,900 रही। यह वृद्धि केवल आंकड़ों में बदलाव नहीं है, बल्कि देश में प्रत्यारोपण चिकित्सा की बढ़ती क्षमता को भी दर्शाती है। बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों में किडनी, लिवर, हृदय और फेफड़े के प्रत्यारोपण के लिए विशेषज्ञ सुविधाएं विकसित हुई हैं। कई राज्यों ने भी अंगदान और प्रत्यारोपण के लिए अपनी संस्थागत व्यवस्था मजबूत की है। हालांकि, प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि अंगों की कमी की समस्या खत्म हो गई है। वास्तव में जैसे-जैसे चिकित्सा सुविधाएं बेहतर हुई हैं और ज्यादा मरीज प्रत्यारोपण के लिए योग्य हो रहे हैं, वैसे-वैसे अंगों की मांग भी बढ़ी है।


2024 में भारत ने मृतक अंगदान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की। NOTTO से जुड़े आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष 1,128 मृतक दाता दर्ज किए गए और इनसे हजारों अंग प्रत्यारोपण संभव हुए। मृतक अंगदान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक उपयुक्त मृतक दाता से एक से अधिक मरीजों को जीवनदान मिल सकता है। एक दाता से दोनों किडनी, लिवर, हृदय, फेफड़े, अग्न्याशय और आंत जैसे अंग प्राप्त किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त कॉर्निया, त्वचा, हड्डी, हृदय वाल्व और रक्त वाहिकाओं जैसे ऊतक भी जरूरतमंद मरीजों के इलाज में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसके बावजूद भारत की विशाल आबादी और प्रत्यारोपण की वास्तविक जरूरत को देखते हुए मृतक दाताओं की संख्या अभी भी बेहद कम है।

भारत का प्रत्यारोपण मॉडल जीवित दाताओं पर ज्यादा निर्भर

भारत के प्रत्यारोपण कार्यक्रम में जीवित दाताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर किडनी और लिवर प्रत्यारोपण में। किडनी दान में एक स्वस्थ व्यक्ति एक किडनी दान कर सकता है, जबकि लिवर में दाता का एक हिस्सा लिया जाता है और शेष लिवर समय के साथ पुनः विकसित होता है। हालांकि, जीवित अंगदान में दाता की सुरक्षा, चिकित्सकीय उपयुक्तता और स्वतंत्र सहमति सर्वोच्च प्राथमिकता हैं। किडनी प्रत्यारोपण की मांग भारत में सबसे अधिक है। डायलिसिस जीवन बचाने वाला उपचार है, लेकिन उपयुक्त मरीजों के लिए प्रत्यारोपण दीर्घकालिक विकल्प हो सकता है। मृतक दाताओं से किडनी की सीमित उपलब्धता के कारण जीवित दाताओं पर निर्भरता बनी हुई है, जिससे बिना उपयुक्त जीवित दाता वाले मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।


लिवर प्रत्यारोपण भी तेजी से बढ़ा है। 2024 में भारत में 2,500 से अधिक लिवर प्रत्यारोपण हुए। इनमें जीवित दाताओं की बड़ी भूमिका है, लेकिन यह दाता के लिए बड़ी सर्जरी है और इसमें जोखिम भी होते हैं। इसलिए मेडिकल जांच, सूचित सहमति और कानूनी प्रक्रिया अनिवार्य हैं। वहीं, हृदय और फेफड़ों जैसे अंगों के लिए मृतक अंगदान मुख्य आधार है। ब्रेन-स्टेम डेथ की समय पर पहचान, परिवार की काउंसलिंग, कानूनी औपचारिकताएं, अंगों की निकासी और तेज परिवहन—इन सभी में बेहतर समन्वय जरूरी है। यही भारत में मृतक अंगदान बढ़ाने की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

                                                                                                                  एक मृतक दाता कई लोगों को दे सकता है जीवन

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मृतक अंगदान की वास्तविक क्षमता को समझना जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति की चिकित्सकीय परिस्थितियां अंगदान के लिए उपयुक्त हैं और परिवार की सहमति तथा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो उसके कई अंग अलग-अलग मरीजों के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। एक उपयुक्त दाता से दोनों किडनी दो अलग मरीजों को दी जा सकती हैं। लिवर का उपयोग एक या परिस्थितियों के अनुसार अधिक प्राप्तकर्ताओं के लिए किया जा सकता है। हृदय और फेफड़े गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकते हैं। इसके अलावा आंखों के कॉर्निया और कई प्रकार के ऊतक भी दूसरे मरीजों के उपचार में उपयोग किए जा सकते हैं। इसलिए मृतक अंगदान को केवल एक अंग के प्रत्यारोपण के रूप में देखना सही नहीं होगा। एक दाता कई परिवारों की जिंदगी बदल सकता है।

अंगदान की शपथ और वास्तविक दान में अंतर

भारत में अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं। NOTTO के माध्यम से नागरिक अंगदान की प्रतिज्ञा यानी प्लेज भी कर सकते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार लाखों नागरिक अंगदान का संकल्प ले चुके हैं। लेकिन अंगदान की प्रतिज्ञा और वास्तविक अंगदान दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी व्यक्ति के अंगों का वास्तविक दान तभी संभव होता है जब मृत्यु ऐसी चिकित्सकीय परिस्थितियों में हो जिसमें अंग प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त हों। इसके बाद निर्धारित चिकित्सकीय, कानूनी और संस्थागत प्रक्रिया पूरी करनी होती है। यानी केवल ज्यादा लोगों का अंगदान की शपथ लेना पर्याप्त नहीं है। अस्पतालों में संभावित दाताओं की पहचान, ब्रेन-स्टेम डेथ का समय पर प्रमाणन, परिवारों की काउंसलिंग और अंगों की तत्काल निकासी की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

परिवार की सहमति सबसे संवेदनशील चरण

अंगदान के मामले में परिवार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। मृत्यु के समय परिवार पहले से ही भावनात्मक संकट में होता है। ऐसे समय में अंगदान की संभावना पर बातचीत बेहद संवेदनशील तरीके से करनी पड़ती है। प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर परिवार को पूरी प्रक्रिया समझा सकते हैं—मृत्यु की चिकित्सकीय स्थिति से लेकर अंगदान की प्रक्रिया, अंगों के उपयोग और गोपनीयता तक। कई बार परिवारों की हिचकिचाहट जागरूकता की कमी, धार्मिक या सामाजिक भ्रांतियों, प्रक्रिया को लेकर गलत धारणाओं या भावनात्मक दबाव के कारण होती है। इसलिए केवल अभियान चलाने के बजाय प्रशिक्षित काउंसलिंग व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है।


भारत में अंगों की प्रतीक्षा कर रहे मरीजों की संख्या उपलब्ध अंगों से कहीं अधिक है। यही कारण है कि कई मरीजों को लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। प्रतीक्षा की अवधि हर मरीज के लिए अलग होती है। यह बीमारी की गंभीरता, रक्त समूह, अंग का आकार, चिकित्सकीय प्राथमिकता, उपलब्ध दाता और अन्य निर्धारित मानदंडों पर निर्भर करती है। कुछ मरीजों को उपयुक्त अंग अपेक्षाकृत जल्दी मिल सकता है, जबकि अन्य को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ सकता है। सबसे गंभीर स्थिति उन मरीजों की होती है जिनकी बीमारी तेजी से बढ़ रही होती है और जिनके लिए प्रत्यारोपण में देरी जीवन के लिए खतरा बन सकती है।

केवल अस्पताल बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी

भारत में प्रत्यारोपण केंद्रों की संख्या बढ़ना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन यह पूरी समस्या का समाधान नहीं है। यदि किसी अस्पताल के पास अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर, विशेषज्ञ सर्जन और आईसीयू सुविधा मौजूद है, लेकिन उपयुक्त अंग उपलब्ध नहीं है, तो प्रत्यारोपण नहीं किया जा सकता। इसलिए अंग प्रत्यारोपण के पूरे मॉडल को एक श्रृंखला के रूप में देखना होगा। संभावित दाता की पहचान से लेकर ब्रेन-स्टेम डेथ प्रमाणन, परिवार की सहमति, अंग निकासी, संरक्षण, परिवहन, आवंटन और प्रत्यारोपण तक हर चरण मजबूत होना चाहिए। एक कमजोर कड़ी पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

NOTTO से ROTTO और SOTTO तक बना नेटवर्क

भारत ने अंगदान और प्रत्यारोपण के लिए बहुस्तरीय संस्थागत नेटवर्क विकसित किया है। राष्ट्रीय स्तर पर NOTTO, क्षेत्रीय स्तर पर ROTTO और राज्य स्तर पर SOTTO जैसी संस्थाएं अंगदान, अंग संग्रह, आवंटन और प्रत्यारोपण के बीच समन्वय में भूमिका निभाती हैं। सरकारी रिपोर्टों के अनुसार देश में पांच क्षेत्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन और 26 राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन काम कर रहे हैं। यह नेटवर्क अस्पतालों से संभावित दाता की जानकारी प्राप्त करने, उपलब्ध अंगों का समन्वय करने, प्रतीक्षा सूची और आवंटन प्रक्रिया में सहायता करने तथा अंगदान संबंधी गतिविधियों को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

1,000 से ज्यादा अस्पताल नेटवर्क से जुड़े

सरकारी आंकड़ों के अनुसार राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण नेटवर्क से 1,090 अस्पताल जुड़े हुए हैं। इनमें 764 प्रत्यारोपण केंद्र, 149 गैर-प्रत्यारोपण अंग निकासी केंद्र और 177 ऊतक केंद्र शामिल हैं। यह विस्तार दिखाता है कि भारत ने केवल बड़े महानगरों तक अंग प्रत्यारोपण की व्यवस्था सीमित नहीं रखी है। फिर भी राज्यों और जिलों के बीच क्षमता में अंतर मौजूद है। बड़े महानगरों में जहां कई अत्याधुनिक प्रत्यारोपण केंद्र उपलब्ध हैं, वहीं छोटे शहरों और दूरदराज के क्षेत्रों में अंग निकासी, ब्रेन-स्टेम डेथ प्रमाणन और प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन की सुविधाएं सीमित हो सकती हैं। अंग प्रत्यारोपण में समय सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। शरीर से निकाले गए अंगों को निर्धारित समय सीमा के भीतर प्राप्तकर्ता तक पहुंचाना होता है। इसीलिए कई मामलों में ग्रीन कॉरिडोर की व्यवस्था की जाती है। इसके जरिए एंबुलेंस या अन्य परिवहन साधनों को प्राथमिकता देकर अंग को तेजी से एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक पहुंचाया जाता है। भारत में अंतरराज्यीय अंग परिवहन के लिए ऐसी व्यवस्थाओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है। लेकिन बड़े शहरों के बाहर भी ऐसी व्यवस्था को समान रूप से मजबूत करने की जरूरत है।

कानून ने व्यवस्था को दिया नियामक आधार

भारत में मानव अंगों और ऊतकों के प्रत्यारोपण की व्यवस्था मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम यानी THOTA के तहत संचालित होती है। इस कानून का उद्देश्य अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को विनियमित करना और अवैध अंग व्यापार जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना है। जीवित दाता के मामले में दाता की स्वतंत्र और सूचित सहमति, चिकित्सकीय उपयुक्तता तथा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। अंगदान का उद्देश्य किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति या सामाजिक प्रभाव के आधार पर अंगों का अनुचित वितरण नहीं, बल्कि निर्धारित चिकित्सकीय और कानूनी मानदंडों के अनुसार जरूरतमंद मरीज तक उपयुक्त अंग पहुंचाना है। अंग अत्यंत दुर्लभ संसाधन हैं। इसलिए इनके आवंटन में पारदर्शिता और निष्पक्षता बेहद महत्वपूर्ण है। अंग उपलब्ध होने पर मरीजों को निर्धारित चिकित्सा मानदंडों के आधार पर प्राथमिकता दी जाती है। इसमें रक्त समूह, चिकित्सकीय जरूरत, प्रतीक्षा अवधि, अंग का आकार और अन्य प्रासंगिक कारक भूमिका निभा सकते हैं। पारदर्शी व्यवस्था मरीजों के भरोसे के लिए भी जरूरी है। यदि लोगों को विश्वास होगा कि अंग जरूरत और निर्धारित नियमों के आधार पर आवंटित किए जा रहे हैं, तो अंगदान के प्रति सामाजिक भरोसा भी मजबूत होगा।

अंगदान को केवल अभियान नहीं, स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा

भारत में अंगदान जागरूकता अभियान चलाए जाते रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञ स्तर पर चुनौती इससे आगे की है। अस्पतालों में ऐसे सिस्टम की जरूरत है जो संभावित दाता की पहचान कर सके और तत्काल संबंधित टीम को सूचना दे सके। इसके लिए आईसीयू और इमरजेंसी विभागों में प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत है। ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की उपलब्धता, परिवार की काउंसलिंग, ब्रेन-स्टेम डेथ प्रमाणन और अंग निकासी टीम के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक है। इस पूरी व्यवस्था को नियमित अस्पताल सेवाओं का हिस्सा बनाने से मृतक अंगदान की वास्तविक संख्या बढ़ाई जा सकती है। भारत में प्रत्यारोपण क्षमता अभी भी बड़े चिकित्सा केंद्रों में अधिक केंद्रित है। महानगरों में विशेषज्ञ डॉक्टर, आईसीयू, सर्जरी और अंग निकासी की सुविधाएं अपेक्षाकृत बेहतर उपलब्ध हैं। इसके विपरीत छोटे शहरों में संभावित दाता मौजूद होने के बावजूद समय पर पहचान और अंग निकासी की व्यवस्था नहीं होने से अवसर समाप्त हो सकता है। इसलिए भविष्य की रणनीति में जिला और क्षेत्रीय अस्पतालों को मजबूत करना जरूरी होगा। ऐसे अस्पतालों को प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर, ब्रेन-स्टेम डेथ पहचान की क्षमता और क्षेत्रीय प्रत्यारोपण नेटवर्क से तत्काल जुड़ाव उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

महिलाओं और परिवारों की भूमिका

भारत में जीवित अंगदान में परिवार के सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। कई मामलों में माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन या अन्य अनुमत रिश्तेदार मरीज के लिए अंगदान करते हैं। लेकिन मृतक अंगदान के मामले में भी परिवार निर्णायक भूमिका निभाता है। इसलिए परिवारों को पहले से अंगदान के बारे में जानकारी होना जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति ने अंगदान की इच्छा व्यक्त की है, तो परिवार को भी इस इच्छा की जानकारी होना वास्तविक समय पर निर्णय लेने की प्रक्रिया को आसान बना सकता है। अंगदान की सफलता केवल चिकित्सा विज्ञान पर निर्भर नहीं करती। यह सामाजिक भरोसे पर भी निर्भर करती है। लोगों को यह भरोसा होना चाहिए कि अंगदान के बाद शरीर के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाएगा, अंगों का उपयोग निर्धारित चिकित्सा प्रक्रिया के अनुसार होगा और उनका आवंटन पारदर्शी तरीके से किया जाएगा। इसी तरह जीवित दाताओं को भरोसा होना चाहिए कि उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य को मरीज के इलाज जितना ही महत्व दिया जाएगा।

भारत के सामने अगली बड़ी चुनौती

भारत ने अंग प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। 2013 से 2024 के बीच वार्षिक प्रत्यारोपण लगभग चार गुना बढ़ना इस क्षेत्र में हुई प्रगति को दर्शाता है। लेकिन अब चुनौती बदल रही है। अगली चुनौती केवल ज्यादा प्रत्यारोपण करने की नहीं, बल्कि ज्यादा उपयुक्त अंग उपलब्ध कराने की है। इसके लिए मृतक अंगदान को बढ़ाना सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक होगा। इसके साथ अस्पतालों में दाता पहचान प्रणाली, ब्रेन-स्टेम डेथ प्रमाणन, परिवार काउंसलिंग, अंग निकासी, संरक्षण और परिवहन की व्यवस्था को मजबूत करना होगा। अंग प्रत्यारोपण के आंकड़े केवल अस्पतालों की उपलब्धि नहीं बताते। इनके पीछे हजारों मरीजों और उनके परिवारों की जिंदगी जुड़ी होती है। एक मरीज जो वर्षों से डायलिसिस पर है, उसके लिए किडनी प्रत्यारोपण जीवन को सामान्य दिशा में वापस ले जाने का अवसर हो सकता है। गंभीर लिवर बीमारी से जूझ रहे मरीज के लिए लिवर प्रत्यारोपण जीवन और मृत्यु के बीच अंतर पैदा कर सकता है। हृदय या फेफड़े की गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए उपयुक्त अंग का समय पर मिलना जीवन बचाने का एकमात्र विकल्प हो सकता है। इसलिए प्रतीक्षा सूची का हर आंकड़ा वास्तव में एक इंसान, एक परिवार और एक उम्मीद का प्रतिनिधित्व करता है।

भारत की अगली छलांग कहां से आएगी?

भारत के पास अब प्रत्यारोपण के लिए मजबूत चिकित्सा क्षमता मौजूद है। देश में विशेषज्ञ सर्जन हैं, बड़े अस्पताल हैं, प्रत्यारोपण केंद्र हैं, राष्ट्रीय और राज्य स्तर का नेटवर्क है और अंगों के आवंटन के लिए संस्थागत व्यवस्था भी मौजूद है। अब जरूरत उस पूरी व्यवस्था को अंगों की उपलब्धता के साथ जोड़ने की है। मृतक अंगदान में वृद्धि, संभावित दाताओं की समय पर पहचान, परिवारों की बेहतर काउंसलिंग, प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर, बेहतर आईसीयू व्यवस्था, तेज अंग परिवहन और छोटे शहरों तक नेटवर्क का विस्तार—ये वे क्षेत्र हैं जिनमें सुधार भारत के प्रत्यारोपण कार्यक्रम को अगले स्तर तक ले जा सकते हैं।


भारत का अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम पिछले एक दशक में तेजी से आगे बढ़ा है। सालाना प्रत्यारोपण की संख्या करीब 5,000 से बढ़कर 18,000 से अधिक हो चुकी है। देश दुनिया के प्रमुख प्रत्यारोपण केंद्रों में अपनी जगह बना चुका है और चिकित्सा क्षमता लगातार बढ़ रही है। लेकिन इस सफलता के बावजूद अंगों की कमी अभी भी सबसे बड़ी बाधा है। विशेष रूप से मृतक अंगदान की कम दर भारत के सामने गंभीर चुनौती है। जीवित दाताओं ने किडनी और लिवर प्रत्यारोपण की जरूरत को काफी हद तक पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन हृदय, फेफड़े और अन्य महत्वपूर्ण अंगों के लिए मृतक दान पर निर्भरता को देखते हुए इस क्षेत्र में सुधार अनिवार्य है।


अब भारत को केवल प्रत्यारोपण केंद्रों की संख्या नहीं बढ़ानी है। उसे ऐसा मजबूत और भरोसेमंद अंगदान तंत्र बनाना होगा जिसमें संभावित दाता की पहचान से लेकर अंग को जरूरतमंद मरीज तक पहुंचाने तक कोई महत्वपूर्ण कड़ी कमजोर न रहे। क्योंकि भारत के लिए अगली बड़ी उपलब्धि केवल यह नहीं होगी कि कितने अंग प्रत्यारोपित हुए, बल्कि यह होगी कि कितने ऐसे मरीजों को समय पर जीवन मिला जो लंबे समय से एक उपयुक्त अंग का इंतजार कर रहे थे। अंगदान की क्षमता बढ़ाना इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिकता होने के साथ-साथ एक व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी भी है। एक व्यक्ति का निर्णय कई जिंदगियों को नई शुरुआत दे सकता है।