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डॉक्टरों पर हमला करने वालों को बेल नहीं मिलनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना पार्षद से पूछा- अस्पताल में घुसकर किसी को भी मार देंगे?
“अस्पताल में घुसकर किसी को भी मारेंगे?” डॉक्टरों पर कथित हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, शिवसेना पार्षद की जमानत पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा—ऐसे हमलावर जमानत के हकदार नहीं।

नई दिल्ली:
अस्पताल में ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ पर कथित हमले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कड़ा रुख अपनाया। कल्याण के शास्त्रीनगर अस्पताल में डॉक्टरों से कथित मारपीट के मामले में शिवसेना पार्षद रमेश सुखरिया म्हात्रे की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों पर हमला करने वाले लोगों को जमानत नहीं मिलनी चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने म्हात्रे से जुड़े मामले की सुनवाई की। म्हात्रे ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा जमानत देते समय लगाई गई कड़ी शर्तों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह राज्य सरकार की ओर से जमानत रद्द करने के लिए दायर की जाने वाली याचिका का इंतजार करेगा। मामले को सोमवार को फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
SC ने डॉक्टरों पर हमले को बताया गंभीर
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों पर अस्पताल के अंदर हुए हमले को गंभीर मामला बताया। बेंच ने कहा कि ऐसे लोगों को जमानत नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि वे मेडिकल प्रोफेशन और डॉक्टरों का सम्मान नहीं करते। अदालत ने सवाल किया कि अगर किसी अस्पताल में भीड़ घुसकर किसी भी व्यक्ति को मारने लगे तो इससे मेडिकल स्टाफ को कितना मानसिक आघात होगा। कोर्ट की इस टिप्पणी से साफ है कि अस्पतालों में डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट मामले को गंभीरता से देख रहा है।
क्या है पूरा मामला?
मामला 6 जुलाई 2026 का है। आरोप है कि नौ महीने की गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा के दौरान अस्पताल में कई घंटे इंतजार करना पड़ा। याचिका में म्हात्रे का दावा है कि महिला के परिवार की ओर से बार-बार फोन किए जाने के बाद वह अस्पताल पहुंचे थे। इसके बाद अस्पताल के कर्मचारियों के साथ विवाद हुआ और कथित तौर पर तीन डॉक्टरों पर हमला किया गया। 7 जुलाई को पुलिस ने FIR दर्ज की और रमेश म्हात्रे को आरोपी नंबर 1 बनाया गया। मामले में उनके साथ अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया।
पहले मजिस्ट्रेट ने दी थी जमानत कल्याण के मजिस्ट्रेट ने 14 जुलाई को म्हात्रे को जमानत दे दी थी। अदालत ने उनकी उम्र, स्वास्थ्य स्थिति, फरार होने की आशंका नहीं होने और मुख्य CCTV फुटेज सुरक्षित होने जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा था। लेकिन डॉक्टरों के विरोध और मामले की गंभीरता को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने 18 जुलाई को स्वतः संज्ञान लिया और मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई जमानत पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने म्हात्रे को सरेंडर करने का निर्देश दिया था।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने बाद में दी जमानत
जांच आगे बढ़ने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने 7 अगस्त को म्हात्रे और उनके तीन सहयोगियों को जमानत दे दी। हालांकि कोर्ट ने कई कड़ी शर्तें लगाईं। इनमें ट्रायल शुरू होने तक महाराष्ट्र से बाहर रहने की शर्त भी शामिल थी। उन्हें गोवा के कैलंगुट में रहने और अंजुना पुलिस स्टेशन में सप्ताह में तीन बार रिपोर्ट करने का निर्देश दिया गया था।
हाईकोर्ट ने मामले को फास्ट ट्रैक करने और विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने का निर्देश भी दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि द्वारा अपने ही मतदाताओं पर हमला लोकतंत्र की व्यवस्था को प्रभावित करता है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में म्हात्रे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमानत देते समय अत्यधिक कठोर शर्तें लगा दी हैं। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या चार्जशीट दाखिल करने के लिए 10 दिन की समयसीमा तय की जा सकती है। वहीं महाराष्ट्र सरकार ने संकेत दिया कि वह म्हात्रे को मिली जमानत को चुनौती देगी। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी मामले में हस्तक्षेप करते हुए जमानत का विरोध किया। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है और राज्य की प्रस्तावित जमानत रद्द करने वाली याचिका का इंतजार करने का संकेत दिया है। मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी।
