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मराठी भाषा की अनिवार्यता पर बॉम्बे हाईकोर्ट में पहुंचा विवाद, 4 कैब ड्राइवरों ने सरकार के फैसले को दी चुनौती
महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी और ऐप कैब चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने का फैसला अब सड़क से निकलकर अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। सरकार के फैसले के खिलाफ चार Uber ड्राइवरों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए सवाल उठाया है कि क्या रोजी-रोटी कमाने के लिए देश के किसी भी हिस्से में जाने वाले भारतीय नागरिक को सिर्फ भाषा के आधार पर ‘बाहरी’ माना जा सकता है? 12 अगस्त की अधिसूचना को चुनौती देने वाली इस PIL ने भाषा, रोजगार और मौलिक अधिकारों के बीच एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया है।

महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ऐप-आधारित कैब चालकों के लिए मराठी भाषा की जानकारी अनिवार्य किए जाने का विवाद अब सीधे बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। चार ऐप-आधारित कैब चालकों ने राज्य सरकार के 12 अगस्त 2026 के नोटिफिकेशन को चुनौती देते हुए जनहित याचिका (PIL) दायर की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि देश के दूसरे हिस्सों से महाराष्ट्र में रोजी-रोटी कमाने आए भारतीय नागरिकों को अपने ही देश में ‘बाहरी’ की तरह नहीं देखा जा सकता। याचिका में इस नियम पर रोक लगाने और 12 अगस्त की अधिसूचना को रद्द करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह व्यवस्था संविधान के तहत मिले समानता, स्वतंत्र आवागमन, भारत के किसी भी हिस्से में रहने और पेशा करने के अधिकारों पर सवाल खड़े करती है।
क्या है महाराष्ट्र सरकार का नया नियम?
महाराष्ट्र सरकार ने 12 अगस्त 2026 को महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1989 में संशोधन किया। इसके तहत ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ऐप-आधारित यात्री परिवहन सेवाओं से जुड़े ड्राइवरों के लिए ‘वर्किंग नॉलेज ऑफ मराठी’ को अनिवार्य किया गया है। नियम के तहत भाषा की जांच के दौरान यदि ड्राइवर आवश्यक स्तर का मराठी ज्ञान प्रदर्शित नहीं कर पाता है तो उसके खिलाफ नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। PIL में दावा किया गया है कि अधिसूचना के तहत असफल रहने वाले ड्राइवरों के लाइसेंस/बैज के निलंबन और बाद में कठोर कार्रवाई का प्रावधान है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य ड्राइवरों को मराठी भाषा का विशेषज्ञ बनाना नहीं, बल्कि यात्रियों और प्रशासन के साथ बुनियादी कामकाजी संवाद सुनिश्चित करना है।
चार Uber ड्राइवरों ने क्यों किया विरोध?
PIL चार Uber कैब ड्राइवरों ने दाखिल की है। याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि वे मराठी भाषा या महाराष्ट्र की संस्कृति का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनकी आपत्ति उस अनिवार्यता से है जिसके कारण भाषा की परीक्षा में असफल होने वाले ड्राइवरों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। याचिका में कहा गया है कि भारत में एकल नागरिकता की संवैधानिक व्यवस्था है। ऐसे में किसी भारतीय नागरिक के महाराष्ट्र आकर रोजगार करने पर ऐसी शर्त लगाना संवैधानिक सवाल पैदा करता है।
किन संवैधानिक अधिकारों का दिया गया हवाला?
याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का हवाला दिया है। अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार से संबंधित है। अनुच्छेद 19(1)(d) भारत के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने और अनुच्छेद 19(1)(e) भारत के किसी भी हिस्से में रहने और बसने का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को कोई भी पेशा, व्यापार या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता देता है। PIL में तर्क दिया गया है कि भाषा की अनिवार्य शर्त के कारण यदि किसी ड्राइवर की रोजी-रोटी प्रभावित होती है तो इस व्यवस्था को इन मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
Motor Vehicles Act को लेकर भी उठाया गया सवाल
याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार के नियम बनाने के अधिकार को भी चुनौती दी है। उनका तर्क है कि Motor Vehicles Act, 1988 में ड्राइविंग लाइसेंस या परमिट के लिए किसी विशेष भाषा का ज्ञान अनिवार्य योग्यता के रूप में निर्धारित नहीं किया गया है। इसलिए PIL में सवाल उठाया गया है कि क्या राज्य सरकार अपने नियमों में संशोधन करके ऐसी अतिरिक्त अयोग्यता या निलंबन का आधार बना सकती है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा विवाद में अदालत को राज्य सरकार के नियम बनाने की शक्ति और केंद्रीय कानून के बीच संबंध की जांच करनी होगी।
2017 का बॉम्बे हाईकोर्ट फैसला फिर चर्चा में
मौजूदा विवाद के बीच बॉम्बे हाईकोर्ट का 2017 का फैसला भी महत्वपूर्ण हो गया है। उस मामले में अदालत ने ऑटो-रिक्शा परमिट के लिए मराठी भाषा के ज्ञान को अनिवार्य करने वाली महाराष्ट्र सरकार की व्यवस्था को चुनौती से जुड़े सवाल पर फैसला दिया था। इसी पुराने कानूनी विवाद का हवाला देकर मौजूदा याचिकाकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या सरकार भाषा की शर्त को परमिट या ड्राइवर की पात्रता से जोड़ सकती है। हालांकि 2026 का मामला पूरी तरह उसी स्थिति का दोहराव नहीं है, क्योंकि इस बार सरकार ने महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स में औपचारिक संशोधन किया है। इसलिए हाईकोर्ट को यह देखना होगा कि नया संशोधन 2017 में उठाए गए कानूनी सवालों को किस हद तक दूर करता है।
राजनीतिक बयान से भी गरमाया मामला
मराठी भाषा की अनिवार्यता का मुद्दा अब केवल अदालत तक सीमित नहीं रहा है। ड्राइवरों के विरोध के बीच महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और BJP नेता देवेंद्र फडणवीस ने सरकार का पक्ष स्पष्ट किया है। फडणवीस ने कहा कि ऑटो और कैब ड्राइवरों को मराठी भाषा का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं है। सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि अपेक्षा केवल बुनियादी कामकाजी मराठी की है, ताकि ड्राइवर यात्रियों और संबंधित अधिकारियों के साथ सामान्य संवाद कर सकें। मुख्यमंत्री का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भाषा नियम के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे ड्राइवरों में बड़ी संख्या गैर-मराठी भाषी ड्राइवरों की बताई जा रही है। 24 अगस्त को विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि नियम का उद्देश्य ड्राइवरों को भाषा का विशेषज्ञ बनाना या तत्काल भारी जुर्माना लगाना नहीं है। वहीं, महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के नेतृत्व में सरकार ने ड्राइवरों की परेशानी कम करने के लिए 161 मराठी प्रशिक्षण केंद्र और एक RTO हेल्पलाइन शुरू करने की घोषणा की है। इसका उद्देश्य नोटिस पाने वाले ड्राइवरों को भाषा सीखने में मदद देना और कथित अवैध जुर्माने या उत्पीड़न की शिकायतों का समाधान करना है।
सड़क पर विरोध, ड्राइवरों की हड़ताल
नियम लागू होने के बाद इसका विरोध भी देखने को मिला। 24 अगस्त को मुंबई के कुछ हिस्सों में ऑटो ड्राइवरों ने विरोध प्रदर्शन किया और तीन दिन की हड़ताल शुरू की। ड्राइवरों का कहना था कि भाषा की शर्त उनकी आजीविका को प्रभावित कर सकती है। सरकार की ओर से इसके बाद यह स्पष्ट किया गया कि ड्राइवरों को मराठी का विशेषज्ञ नहीं बनना है और नियम का उद्देश्य केवल कामकाज के स्तर पर भाषा का ज्ञान सुनिश्चित करना है।
नियम लागू होने के बाद कितने ड्राइवरों पर कार्रवाई?
नियम के अमल के बाद RTO अधिकारियों ने ड्राइवरों की मराठी दक्षता की जांच शुरू की। 25 अगस्त की रिपोर्टों के अनुसार महाराष्ट्र में 331 ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों को मराठी दक्षता पर्याप्त नहीं पाए जाने पर नोटिस जारी किए गए थे। इनमें 139 ड्राइवर मुंबई महानगर क्षेत्र के थे। इसके चलते ड्राइवरों में यह आशंका बढ़ी कि भाषा की परीक्षा में असफल रहने पर उनके बैज या परमिट पर कार्रवाई हो सकती है। यही मुद्दा अब हाईकोर्ट की याचिका में भी आजीविका से जोड़कर उठाया गया है।
सरकार का उद्देश्य क्या है?
सरकार का पक्ष है कि सार्वजनिक परिवहन से जुड़े ड्राइवरों के लिए स्थानीय यात्रियों और अधिकारियों के साथ बुनियादी संवाद जरूरी है। इसलिए कामकाज के स्तर पर मराठी भाषा की जानकारी को अनिवार्य किया गया है। सरकार ने इसके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था भी शुरू की है। 161 प्रशिक्षण केंद्रों की घोषणा इसी दिशा में की गई है। इससे स्पष्ट है कि सरकार एक तरफ नियम को लागू कर रही है, वहीं दूसरी तरफ गैर-मराठी भाषी ड्राइवरों को इसे पूरा करने के लिए प्रशिक्षण और समय देने की कोशिश भी कर रही है।
अब बॉम्बे हाईकोर्ट में क्या होगा?
चार कैब ड्राइवरों की PIL में 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना को रद्द करने और इसके क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग की गई है। मामले को बॉम्बे हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रविंद्र घुगे की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने मेंशन किए जाने की संभावना है। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि हाईकोर्ट ने इस नियम पर रोक लगा दी है। अभी अदालत को याचिकाकर्ताओं की दलीलों और राज्य सरकार के जवाब के आधार पर यह देखना है कि नियम संवैधानिक और वैधानिक कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
यह विवाद सिर्फ मराठी भाषा बनाम दूसरी भाषाओं का मुद्दा नहीं है। इसके केंद्र में तीन बड़े सवाल हैं—स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए सरकार की नियामक शक्ति कितनी है, दूसरे राज्यों से आए भारतीय नागरिकों के रोजगार और आवागमन के अधिकार की सीमा क्या है और राज्य सरकार Motor Vehicles Rules के तहत कितनी अतिरिक्त पात्रता शर्तें लागू कर सकती है। एक तरफ सरकार स्थानीय भाषा में बुनियादी संवाद को सार्वजनिक परिवहन के लिए जरूरी बता रही है, वहीं याचिकाकर्ता इसे आजीविका और मौलिक अधिकारों से जोड़ रहे हैं। अब इस पूरे विवाद का अंतिम जवाब बॉम्बे हाईकोर्ट की सुनवाई में सामने आएगा। अदालत का फैसला महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि स्थानीय भाषा को रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं से जोड़ने वाली भविष्य की नीतियों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
