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महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों को बड़ी राहत, मराठी सीखने के लिए मिला 1 साल; बॉम्बे हाईकोर्ट में सरकार का बड़ा बयान

मुंबई की सड़कों पर ऑटो-टैक्सी चलाने वाले ड्राइवरों के लिए फिलहाल राहत की खबर है, लेकिन मराठी भाषा का विवाद अभी थमा नहीं है। महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में बड़ा आश्वासन देते हुए कहा है कि राज्यभर के ऑटो, टैक्सी और कैब ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए पूरे एक साल का समय दिया जाएगा। सरकार के इस बयान के बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया। हालांकि, मराठी की ‘वर्किंग नॉलेज’ की मूल शर्त बरकरार है और इस फैसले ने महाराष्ट्र की सियासत को भी गरमा दिया है।

Sonali31 अग. 2026, 04:59 PM IST
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महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों को बड़ी राहत, मराठी सीखने के लिए मिला 1 साल; बॉम्बे हाईकोर्ट में सरकार का बड़ा बयान


मुंबई: 

महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ऐप-बेस्ड कैब ड्राइवरों को बड़ी राहत मिली है। राज्य सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि राज्यभर के ऑटो, टैक्सी और कैब ड्राइवरों को मराठी भाषा सीखने और उसमें कामचलाऊ दक्षता हासिल करने के लिए एक साल का समय दिया जाएगा। सरकार के इस आश्वासन को रिकॉर्ड करने के बाद अदालत ने मराठी की ‘वर्किंग नॉलेज’ अनिवार्य करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका का निपटारा कर दिया।


क्या है पूरा मामला?

महाराष्ट्र सरकार ने ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ऐप-बेस्ड कैब ड्राइवरों के लिए मराठी की ‘working knowledge’ अनिवार्य की थी। इसी शर्त के खिलाफ चार ऐप-कैब ड्राइवरों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भाषा की यह अनिवार्यता उनकी आजीविका को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने तर्क दिया कि Motor Vehicles Act, 1988 में ड्राइविंग लाइसेंस या संबंधित परमिट के लिए ऐसी भाषा संबंधी शर्त नहीं है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का भी हवाला देते हुए दावा किया गया कि दूसरे राज्यों से महाराष्ट्र में रोजी-रोटी कमाने आए ड्राइवरों के लिए मराठी को अनिवार्य बनाना उनके मौलिक अधिकारों पर असर डाल सकता है।


29 अगस्त को हाईकोर्ट में क्या हुआ?

29 अगस्त 2026 को मामले की सुनवाई बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने हुई। बेंच में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रविंद्र वी. घुगे और जस्टिस गौतम ए. अंखड़ शामिल थे। राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए एक वर्ष का अतिरिक्त समय दिया जाएगा। सरकार के इस बयान को अदालत ने रिकॉर्ड किया और इसके बाद PIL का निपटारा कर दिया। यानी हाईकोर्ट ने मराठी की मूल अनिवार्यता को रद्द नहीं किया है। राहत सिर्फ इतनी है कि ड्राइवरों को निर्धारित भाषा संबंधी मानक पूरा करने के लिए अब एक साल की अतिरिक्त अवधि मिलेगी।


सरकार ने क्यों दी एक साल की मोहलत?

भाषा नियम को लेकर ड्राइवरों के बीच असंतोष के बाद प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने अपनी समस्याएं रखी थीं। इसके बाद सरकार ने मराठी सीखने के लिए एक साल का समय देने का फैसला किया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि ड्राइवरों को मराठी का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं है। उन्हें यात्रियों से सामान्य बातचीत और रोजमर्रा के काम के लिए आवश्यक functional Marathi जानना पर्याप्त होगा। राज्य सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी की रोजी-रोटी छीनना नहीं, बल्कि महाराष्ट्र में काम करने वाले ड्राइवरों को स्थानीय भाषा का बुनियादी ज्ञान देना है।


एकनाथ शिंदे का भी आया बयान

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे ने भी मराठी सीखने की पहल का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में बड़ी संख्या में गैर-मराठी ड्राइवरों ने मराठी सीखने में रुचि दिखाई है। शिंदे के अनुसार, करीब 1.60 लाख गैर-मराठी ड्राइवरों ने मराठी सीखने की प्रक्रिया में हिस्सा लिया है। सरकार का तर्क है कि यह दिखाता है कि ड्राइवरों में भाषा सीखने को लेकर विरोध के बजाय स्वीकार्यता भी मौजूद है।


परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने क्या कहा?

महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने कहा कि सरकार किसी की आजीविका छीनना नहीं चाहती। उन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा दी गई एक साल की मोहलत को महायुति सरकार का फैसला बताया। हालांकि, सरनाईक ने यह संकेत भी दिया कि एक साल की अवधि पूरी होने के बाद दोबारा अतिरिक्त समय मांगने की स्थिति नहीं होनी चाहिए। यानी सरकार मराठी की मूल शर्त को लंबे समय तक टालने के पक्ष में नहीं है।


संजय राउत ने सरकार पर साधा निशाना

वहीं शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाए। राउत ने आरोप लगाया कि ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए एक साल की अतिरिक्त मोहलत देने का फैसला ‘दिल्ली के दबाव’ में लिया गया है। उन्होंने दावा किया कि इस फैसले के पीछे आगामी उत्तर प्रदेश चुनावों को लेकर राजनीतिक गणित भी हो सकता है। राउत ने महायुति सरकार और खासकर BJP की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मराठी भाषा के मुद्दे पर सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।


MNS ने भी किया विरोध

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी MNS ने भी एक साल की मोहलत का विरोध किया है। MNS नेता अमित ठाकरे ने सरकार के फैसले पर नाराजगी जताई और मराठी भाषा की अनिवार्यता को कमजोर किए जाने का विरोध किया। MNS की परिवहन शाखा की ओर से इस फैसले को अदालत में चुनौती देने के संकेत भी दिए गए हैं। पार्टी का रुख है कि महाराष्ट्र में काम करने वाले ड्राइवरों को मराठी का ज्ञान होना चाहिए और सरकार को इस नियम के क्रियान्वयन में ढील नहीं देनी चाहिए।


कितने ड्राइवरों पर पड़ेगा असर?

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मुंबई और महाराष्ट्र के परिवहन क्षेत्र में बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों से आए ड्राइवर काम करते हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह आशंका जताई गई कि मराठी की अनिवार्यता का सीधा असर उन ड्राइवरों की आजीविका पर पड़ सकता है जो लंबे समय से महाराष्ट्र में काम कर रहे हैं लेकिन मराठी में दक्ष नहीं हैं। दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि नियम का उद्देश्य किसी को नौकरी से हटाना नहीं है, बल्कि यात्रियों और ड्राइवरों के बीच बेहतर संवाद तथा राज्य की आधिकारिक भाषा के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।


हाईकोर्ट के आदेश का असली मतलब क्या है?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि मराठी सीखने की शर्त असंवैधानिक है या इसे खत्म किया जाए। अदालत ने राज्य सरकार द्वारा दिए गए एक साल के अतिरिक्त समय के आश्वासन को रिकॉर्ड किया और उसके आधार पर याचिका का निपटारा किया। इसका मतलब साफ है कि मराठी की ‘working knowledge’ से जुड़ी मूल नीति अभी कायम है। फिलहाल ड्राइवरों को सिर्फ इसे पूरा करने के लिए एक साल की मोहलत मिली है।


राजनीति और भाषा का मुद्दा साथ-साथ

इस मामले ने महाराष्ट्र में भाषा और रोजगार के पुराने राजनीतिक विवाद को फिर सामने ला दिया है। एक तरफ सरकार मराठी के इस्तेमाल और बुनियादी ज्ञान को जरूरी बता रही है, वहीं विपक्ष और कुछ राजनीतिक दल सरकार के फैसले के पीछे राजनीतिक मजबूरियां देख रहे हैं। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि एक साल की अवधि खत्म होने के बाद सरकार नियम को किस तरह लागू करती है और क्या उस समय फिर से अदालत में नई चुनौती सामने आती है। फिलहाल बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने आया मामला सरकार के एक साल के आश्वासन के साथ खत्म हो गया है, लेकिन मराठी भाषा की अनिवार्यता को लेकर महाराष्ट्र की राजनीति में बहस अभी खत्म होती नहीं दिख रही है।