law-order

“माई लॉर्ड्स, कृपया इसे रिकॉर्ड करें…” आखिर वकील क्यों करते हैं ऐसी गुजारिश? कोर्ट की छोटी-सी ऑर्डर शीट के पीछे छिपी बड़ी कानूनी चिंता

अदालत में बहस हुई, जजों ने सवाल पूछे, वकीलों ने जवाब दिए और कई अहम बातें सामने आईं… लेकिन अगले दिन जब कोर्ट का आदेश आया तो उसमें सिर्फ दो लाइनें थीं। यहीं से एक बड़ा कानूनी सवाल खड़ा होता है—अगर सुनवाई के दौरान कही गई कोई महत्वपूर्ण बात रिकॉर्ड में ही दर्ज न हो, तो कल यह कैसे तय होगा कि अदालत में आखिर हुआ क्या था? “My Lords, may kindly record…” वकीलों की यह आम गुजारिश महज औपचारिकता नहीं, बल्कि भविष्य के कानूनी विवाद से बचाने वाली एक अहम कोशिश है।

Sonali29 अग. 2026, 12:07 PM IST
खबर शेयर करें:
“माई लॉर्ड्स, कृपया इसे रिकॉर्ड करें…” आखिर वकील क्यों करते हैं ऐसी गुजारिश? कोर्ट की छोटी-सी ऑर्डर शीट के पीछे छिपी बड़ी कानूनी चिंता

अदालत में कई बार घंटों तक बहस होती है, जज सवाल पूछते हैं, वकील जवाब देते हैं, कोई पक्ष अपनी दलील छोड़ देता है तो कोई सीमित रियायत या आश्वासन देता है। लेकिन सुनवाई खत्म होने के बाद अपलोड होने वाला आदेश महज कुछ पंक्तियों का होता है—“Heard learned counsel. Issue notice. Status quo to be maintained.”

यहीं से एक ऐसी कानूनी परेशानी जन्म ले सकती है जिसका असर महीनों या वर्षों बाद सामने आता है। अगली सुनवाई में नया जज हो, बेंच बदल जाए या मामला अपील में पहुंच जाए तो सवाल उठ सकता है—क्या पिछली तारीख पर यह मुद्दा उठाया गया था? क्या किसी पक्ष ने कोई रियायत दी थी? क्या कोर्ट ने किसी दलील को खारिज किया था या उस पर विचार ही नहीं किया? 28 अगस्त 2026 को प्रकाशित एक विस्तृत कानूनी कॉलम ने इसी महत्वपूर्ण सवाल को सामने रखा है—क्या हर शब्द को रिकॉर्ड करना जरूरी है, या कम-से-कम उन महत्वपूर्ण घटनाओं को दर्ज किया जाना चाहिए जो आगे चलकर विवाद का आधार बन सकती हैं?

कोर्ट का रिकॉर्ड इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

भारतीय न्याय व्यवस्था में अदालत के अपने रिकॉर्ड को विशेष महत्व प्राप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने 1982 के State of Maharashtra v. Ramdas Shrinivas Nayak मामले में स्पष्ट किया था कि न्यायालय के फैसले में यह दर्ज है कि सुनवाई के दौरान क्या हुआ, तो सामान्य तौर पर उस रिकॉर्ड को बाद में पक्षकार हलफनामे या अन्य सबूत के जरिए चुनौती नहीं दे सकता। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि किसी पक्ष को लगता है कि अदालत ने सुनवाई के दौरान हुई किसी बात को गलत दर्ज किया है, तो उसे उसी समय उस बेंच के सामने रिकॉर्ड में सुधार की मांग करनी चाहिए, जब घटनाक्रम न्यायाधीशों की स्मृति में ताजा हो।

यानी अदालत के रिकॉर्ड की विश्वसनीयता न्यायिक प्रक्रिया का मूल हिस्सा है।

लेकिन सवाल तब उठता है जब बात रिकॉर्ड ही न हुई हो

यहीं इस बहस का सबसे अहम पहलू सामने आता है। अगर अदालत के आदेश में लिखा है कि किसी वकील ने कोई बात स्वीकार की, कोई तथ्य माना या कोई रियायत दी, तो उस रिकॉर्ड को विशेष महत्व मिलेगा। लेकिन यदि सुनवाई में कोई महत्वपूर्ण मुद्दा उठा और आदेश में उसका कोई उल्लेख ही नहीं है, तो बाद में यह पता लगाना कठिन हो सकता है कि उस मुद्दे पर वास्तव में क्या हुआ था। उदाहरण के लिए, किसी मामले में 15 मिनट तक अधिकार-क्षेत्र यानी jurisdiction पर बहस हुई। जज ने सवाल किए और दोनों पक्षों ने अपना-अपना पक्ष रखा। लेकिन आदेश में सिर्फ इतना लिखा गया— “Heard learned counsel. Issue notice. Status quo to be maintained.”

कुछ महीने बाद जब मामला दूसरी बेंच के सामने आता है तो एक पक्ष कह सकता है कि jurisdiction का मुद्दा पिछली सुनवाई में खारिज हो चुका था। दूसरा पक्ष कह सकता है कि उस पर फैसला हुआ ही नहीं था। ऐसी स्थिति में विवाद कानून के मुद्दे से हटकर इस बात पर पहुंच जाता है कि पिछली सुनवाई में आखिर हुआ क्या था।

सुप्रीम कोर्ट का पुराना सिद्धांत: जो रिकॉर्ड हुआ, वही महत्वपूर्ण

State of Maharashtra v. Ramdas Shrinivas Nayak मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक रिकॉर्ड को लेकर बेहद सख्त दृष्टिकोण अपनाया था। अदालत ने कहा था कि जजों द्वारा अपने फैसले में दर्ज की गई सुनवाई की घटनाओं को बाद में बार में दिए गए बयान या हलफनामे के जरिए contradict नहीं किया जा सकता। हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि यदि रिकॉर्ड में वास्तविक गलती हुई है, तो संबंधित पक्ष को उसी न्यायाधीश या उसी बेंच के सामने तुरंत सुधार की मांग करनी चाहिए। इस सिद्धांत का व्यावहारिक अर्थ यह है कि “रिकॉर्ड” केवल औपचारिकता नहीं है। बाद की पूरी मुकदमेबाजी उसी रिकॉर्ड पर निर्भर कर सकती है।

वकील की हर बात क्लाइंट को बांधती है क्या?

यहां दूसरा महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—अगर सुनवाई के दौरान वकील ने कोई बात मान ली या कोई concession दे दिया, तो क्या वह हमेशा क्लाइंट पर बाध्यकारी होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने Himalayan Cooperative Group Housing Society v. Balwan Singh (2015) में इस संबंध में महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया था। अदालत ने माना कि वकील द्वारा किए गए स्पष्ट और unequivocal factual admissions सामान्यतः क्लाइंट को बांध सकते हैं। लेकिन वकील को ऐसा अधिकार नहीं माना जा सकता कि वह बिना उचित निर्देश के क्लाइंट के महत्वपूर्ण substantive legal rights को त्याग दे या समाप्त कर दे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के प्रश्न या legal conclusions पर वकील की बात को उसी तरह क्लाइंट पर बाध्यकारी नहीं माना जा सकता जैसे स्पष्ट factual admission को। इसलिए “माई लॉर्ड्स, कृपया इसे रिकॉर्ड करें” जैसी गुजारिश कई बार बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि कोई undertaking, concession या सीमित सहमति दी गई है, तो उसका रिकॉर्ड बाद में विवाद को रोक सकता है।

वकील और क्लाइंट के अधिकारों की सीमा

Himalayan Cooperative मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वकील की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही थी। वकील अदालत और क्लाइंट के बीच महत्वपूर्ण कड़ी है और उसे क्लाइंट के निर्देशों के अनुरूप काम करना चाहिए। अदालत ने माना कि वकील मुकदमे की रणनीति से जुड़े कई फैसले स्वयं ले सकता है, लेकिन ऐसे निर्णय जो क्लाइंट के substantive rights को प्रभावित करते हैं, उनके लिए उचित निर्देश जरूरी हो सकते हैं। यही कारण है कि सुनवाई के दौरान की गई किसी महत्वपूर्ण concession या undertaking को आदेश में दर्ज कराना आगे की कानूनी अनिश्चितता को कम कर सकता है।

“Courts speak through their orders” लेकिन क्या आदेश पूरी सुनवाई का रिकॉर्ड है?

भारतीय न्याय व्यवस्था में यह स्थापित सिद्धांत है कि अदालत अपने आदेशों के माध्यम से बोलती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर आदेश सुनवाई में हुई प्रत्येक बातचीत का verbatim transcript होता है। न्यायाधीशों के लिए हर दलील, हर सवाल और हर उत्तर को आदेश में शामिल करना व्यावहारिक नहीं है। ऐसा करने पर अदालतों के आदेश बेहद लंबे हो सकते हैं। समस्या वहां पैदा होती है जहां किसी मौखिक घटना का बाद में कानूनी महत्व पैदा हो जाता है।

मसलन:

  • jurisdiction पर कोई महत्वपूर्ण concession;

  • किसी तथ्य की स्पष्ट स्वीकारोक्ति;

  • कोई undertaking;

  • किसी राहत को लेकर सीमित सहमति;

  • किसी आपत्ति को वापस लेना;

  • किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को खुला छोड़ना।

ऐसी बातें यदि रिकॉर्ड में नहीं आतीं तो बाद में “क्या हुआ था?” का विवाद खड़ा हो सकता है।

भारत में डिजिटल कोर्ट रिकॉर्ड तेजी से बढ़ रहा है

इस बहस का एक आधुनिक पहलू भी है। भारत का e-Courts सिस्टम अब केवल कागजी आदेशों तक सीमित नहीं है। National Judicial Data Grid (NJDG) अदालतों के orders, judgments और case details का डिजिटल डेटाबेस उपलब्ध कराता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अदालतों में 618 करोड़ से अधिक पन्नों के रिकॉर्ड—legacy records सहित—digitise किए जा चुके हैं। डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ case status, cause lists और court orders तक ऑनलाइन पहुंच भी बढ़ी है। इससे अदालत के औपचारिक रिकॉर्ड तक पहुंच आसान हुई है, लेकिन इससे एक अलग सवाल भी उठता है—क्या भविष्य में formal orders के साथ proceedings का अधिक व्यवस्थित transcript या authenticated record भी होना चाहिए?

ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग: समाधान या नई चुनौती?

भारत में अदालतों की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग को लेकर पहले भी न्यायिक बहस हो चुकी है। दिल्ली हाईकोर्ट ने Deepak Khosla v. Union of India मामले में अदालत की कार्यवाही की audio/video recording को लेकर authentication की समस्या पर विचार किया था। कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई थी कि तकनीक से recording में छेड़छाड़ या editing की संभावना भी पैदा होती है और किसी recording को judicial review में इस्तेमाल करने के लिए authentication की व्यवस्था जरूरी होगी।

यानी केवल रिकॉर्डिंग उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह भी है कि कौन-सी recording आधिकारिक मानी जाएगी, उसका सुरक्षित storage कैसे होगा और अदालत में उसकी authenticity कैसे साबित होगी?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में रिकॉर्डिंग और रिपोर्टिंग के बीच अंतर स्पष्ट किया

जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने courtroom proceedings की recording और circulation को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की थी। बाद में 5 अगस्त को प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि recognized news outlets अदालत की कार्यवाही की reporting कर सकते हैं, लेकिन proceedings के audio/video clips को अपने reports में इस्तेमाल नहीं कर सकते। यह मामला courtroom proceedings की selective clipping, editing और decontextualised circulation को लेकर उठे सवालों से जुड़ा था। इससे एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है—अदालत की कार्यवाही का सार्वजनिक reporting record और अदालत का official authenticated record दो अलग चीजें हैं।

दुनिया के दूसरे न्याय तंत्रों से क्या सीख?

दूसरे देशों में भी अदालत की कार्यवाही को रिकॉर्ड करने और उसके आधिकारिक transcript को संरक्षित करने को लेकर अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। इंग्लैंड और वेल्स में court recording को लेकर statutory safeguards मौजूद हैं और official transcripts के लिए न्यायिक रिकॉर्डिंग की व्यवस्था अलग तरीके से नियंत्रित की जाती है। दक्षिण अफ्रीका में defective या missing trial records के reconstruction के लिए भी न्यायिक प्रक्रियाएं विकसित हुई हैं। वहां presiding officer की सहायता, parties के records, notes और अन्य उपलब्ध सामग्री के आधार पर proceedings को reconstruct करने का रास्ता अपनाया जा सकता है। इन व्यवस्थाओं से भारत के लिए एक विचार निकलता है—हर शब्द को आदेश में लिखना जरूरी नहीं, लेकिन महत्वपूर्ण procedural events के लिए एक विश्वसनीय और authenticated record उपयोगी हो सकता है।

आखिर समाधान क्या हो सकता है?

इस बहस का समाधान यह नहीं है कि हर अदालत के हर आदेश को पूरी hearing transcript में बदल दिया जाए। व्यावहारिक रास्ता यह हो सकता है कि महत्वपूर्ण मौखिक घटनाओं को स्पष्ट रूप से order sheet में दर्ज किया जाए। 

खासकर:

  1. महत्वपूर्ण concessions;

  2. undertakings;

  3. admissions of fact;

  4. किसी objection को वापस लेना;

  5. किसी मुद्दे पर court का स्पष्ट determination;

  6. किसी महत्वपूर्ण प्रश्न को खुला रखना;

  7. parties द्वारा स्वीकार की गई procedural position।

ऐसी चीजें दर्ज होने से बाद में विवाद की गुंजाइश काफी कम हो सकती है।

असली सवाल: क्या अदालत की मौखिक प्रक्रिया भी न्यायिक इतिहास का हिस्सा है?

अदालत का आदेश न्याय का औपचारिक परिणाम है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया केवल अंतिम आदेश तक सीमित नहीं होती। बहस होती है। सवाल पूछे जाते हैं। पक्षकार अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं। कुछ बातें स्वीकार की जाती हैं और कुछ छोड़ी जाती हैं। कई बार इसी प्रक्रिया से यह समझ आता है कि कोर्ट ने किसी अंतरिम आदेश तक कैसे पहुंच बनाई। इसलिए सवाल यह नहीं कि “हर शब्द रिकॉर्ड किया जाए या नहीं।” असली सवाल यह है कि क्या कोई ऐसी महत्वपूर्ण courtroom event, जिसका बाद में कानूनी प्रभाव पड़ सकता है, सिर्फ इसलिए गायब हो जानी चाहिए क्योंकि अंतिम आदेश संक्षिप्त था? शायद “My Lords, may kindly record…” की गुजारिश इसी चिंता की सबसे सरल अभिव्यक्ति है। क्योंकि मुकदमे में आज कही गई एक छोटी-सी बात कल किसी बड़े विवाद का केंद्र बन सकती है।