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राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस पर लखनऊ विश्वविद्यालय में सजी हस्तशिल्प प्रदर्शनी l

राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस के अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के कला एवं शिल्प महाविद्यालय में हस्तशिल्प और पारंपरिक वस्त्र कला पर आधारित प्रदर्शनी आयोजित की गई। प्रदर्शनी में विद्यार्थियों और युवा कलाकारों ने विभिन्न हस्तशिल्प विधाओं और आंचलिक वस्त्र कलाओं के आकर्षक नमूने प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में भारतीय हथकरघा और पारंपरिक शिल्प के संरक्षण, संवर्धन और प्रभावी दस्तावेजीकरण पर जोर दिया गया। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हर वर्ष 7 अगस्त को भारतीय बुनकरों और हथकरघा परंपरा के योगदान को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है।

Kashish Rai08 अग. 2026, 03:38 PM IST
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राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस पर लखनऊ विश्वविद्यालय में सजी हस्तशिल्प प्रदर्शनी l

लखनऊ। राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस के अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के कला एवं शिल्प महाविद्यालय में शुक्रवार को विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस दौरान हस्तशिल्प और पारंपरिक वस्त्र कला की विभिन्न विधाओं पर आधारित आकर्षक प्रदर्शनी लगाई गई। प्रदर्शनी में विद्यार्थियों और युवा कलाकारों ने बढ़-चढ़कर भाग लेते हुए अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम का शुभारंभ ललित कला विभाग के प्रधानाचार्य एवं संकाय अध्यक्ष डॉ. रतन कुमार और आचार्य आलोक कुमार ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। उद्घाटन के बाद अतिथियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और विद्यार्थियों की कलाकृतियों की सराहना की। प्रदर्शनी में भारतीय हस्तशिल्प, पारंपरिक वस्त्र, आंचलिक डिजाइनों और सांस्कृतिक प्रतीकों पर आधारित कलाकृतियां विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं।


डॉ. रतन कुमार ने कहा कि टेक्सटाइल विभाग के विद्यार्थियों ने लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन कर लखनऊ विश्वविद्यालय और महाविद्यालय का नाम रोशन किया है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों की रचनात्मकता और पारंपरिक कला के प्रति उनकी रुचि संस्थान की समृद्ध शैक्षणिक परंपरा को दर्शाती है। उन्होंने बताया कि लखनऊ विश्वविद्यालय के कई पूर्व छात्र देश की प्रतिष्ठित संस्थाओं में टेक्सटाइल और वस्त्र कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं। यह उपलब्धि विश्वविद्यालय के लिए गौरव की बात है और वर्तमान विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक भी है।


आचार्य आलोक कुमार ने कहा कि भारतीय हस्तशिल्प सदियों से देश और दुनिया के लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा है। डिजिटल युग में भी भारतीय संवेदनाओं, पारंपरिक मोटिफ और सांस्कृतिक प्रतीकों पर आधारित डिजाइनों की मांग लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय वस्त्र कला वैश्विक स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है और युवा पीढ़ी में भी इसके प्रति रुचि बढ़ रही है। प्रदर्शनी के दौरान विद्यार्थियों और अतिथियों के समक्ष विभिन्न हस्तशिल्प विधाओं तथा आंचलिक वस्त्र कला के उत्कृष्ट नमूने प्रस्तुत किए गए। विशेषज्ञों ने इन कलाओं के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय वस्त्र परंपरा केवल एक कला नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक बाजार और डिजिटल माध्यमों के विस्तार के साथ पारंपरिक वस्त्र कला को नए अवसर मिल रहे हैं। यदि पारंपरिक डिजाइनों को आधुनिक जरूरतों और तकनीक से जोड़ा जाए, तो युवा कलाकारों और कारीगरों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

कार्यक्रम का आयोजन डॉ. पूनम जायसवाल ने किया। इस अवसर पर डॉ. पूनम जायसवाल, किरण आर्या, आचार्य रविकांत पांडे, अमरनाथ गौर और सुमित कुमार सहित अनेक शिक्षक, कलाकार और गणमान्य अतिथि मौजूद रहे।


समापन अवसर पर सुमित कुमार ने कला गतिविधियों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक कला के संरक्षण और उसके प्रभावी प्रचार-प्रसार के लिए कलाकृतियों, तकनीकों और कलाकारों से जुड़ी जानकारी का दस्तावेज तैयार करना बेहद जरूरी है। उन्होंने युवा कलाकारों से भारतीय हस्तशिल्प और वस्त्र कला के संरक्षण की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। समारोह के अंत में विद्यार्थियों ने भारतीय हथकरघा और पारंपरिक शिल्प के संरक्षण तथा संवर्धन का संकल्प लिया।