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लोन गारंटर सावधान! कर्जदार के डिफॉल्ट पर बैंक सीधे गारंटर से कर सकता है वसूली, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

अगर आपने किसी के बैंक लोन में गारंटर बनकर हस्ताक्षर किए हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद अहम है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने Vineet Pandey बनाम State of U.P. मामले में गारंटर की जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्ज की अदायगी में डिफॉल्ट होने पर गारंटर की देनदारी केवल औपचारिक नहीं रहती, बल्कि कानून के तहत वह कर्जदार के साथ अपनी गारंटी के दायरे में भुगतान के लिए जिम्मेदार हो सकता है। मामले में वेतन से ₹10,000 की कटौती को चुनौती दी गई थी, जिस पर कोर्ट ने गारंटर की वैधानिक जिम्मेदारी और बैंक की वसूली के अधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों पर विचार किया।

Sonali11 अग. 2026, 03:45 PM IST
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लोन गारंटर सावधान! कर्जदार के डिफॉल्ट पर बैंक सीधे गारंटर से कर सकता है वसूली, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला


लखनऊ: 

किसी के लोन का गारंटर बनना अब कितना बड़ा वित्तीय जोखिम हो सकता है, इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले से समझा जा सकता है। कोर्ट ने साफ किया है कि मुख्य कर्जदार के लोन डिफॉल्ट करने पर बैंक या लेनदार को हर स्थिति में पहले उसी कर्जदार से पूरी रकम वसूलने का इंतजार करना जरूरी नहीं है। सामान्य कानूनी स्थिति में गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार के साथ co-extensive यानी सह-विस्तृत हो सकती है और लेनदार गारंटर के खिलाफ भी सीधे कार्रवाई कर सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने Vineet Pandey और Anoop Kumar Mishra की दो याचिकाओं पर 6 अगस्त 2026 को यह फैसला सुनाया। दोनों याचिकाकर्ताओं ने अपने सहकर्मी Vikrant Dubey के लिए लिए गए लोन में गारंटर की भूमिका निभाई थी। कोर्ट ने दोनों रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए बैंक द्वारा उनके वेतन से हर महीने ₹10,000 की प्रस्तावित वसूली को कानूनी रूप से टिकाऊ माना।


क्या है पूरा मामला?

Vineet Pandey और Anoop Kumar Mishra बलरामपुर पोस्ट ऑफिस में Postal Assistant के रूप में कार्यरत थे। उनके सहकर्मी Vikrant Dubey, जो गोंडा जिले के मनकापुर पोस्ट ऑफिस में Postal Assistant थे, ने वर्ष 2022-23 के दौरान U.P. Postal Primary Cooperative Bank Limited से तीन लोन लिए थे। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक इन लोन में ₹50,000 का Festival Loan, ₹3 लाख का Short-Term Loan और ₹18 लाख का Personal Loan शामिल था। यानी तीनों ऋणों की कुल मूल राशि ₹21.50 लाख थी। दोनों याचिकाकर्ता इन ऋणों के गारंटर बने थे।


कर्जदार ने लोन चुकाना बंद किया तो गारंटरों पर आई बारी

जब मुख्य कर्जदार Vikrant Dubey ने लोन की अदायगी में डिफॉल्ट किया तो बैंक ने उसके खिलाफ recovery proceedings शुरू कीं। इसके साथ ही बैंक ने दोनों गारंटरों से भी बकाया रकम की वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी। बैंक ने Postal Department को पत्र भेजकर दोनों कर्मचारियों के वेतन से ₹10,000 प्रति माह काटने का अनुरोध किया। इस प्रस्तावित salary deduction को दोनों कर्मचारियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।


गारंटरों ने हाईकोर्ट में क्या दलील दी?

याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि बैंक को पहले मुख्य कर्जदार के खिलाफ उपलब्ध सभी remedies का इस्तेमाल करना चाहिए। उनके मुताबिक जब तक principal borrower से वसूली की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक गारंटरों से रकम वसूलना उचित नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि principal borrower और guarantor से एक साथ recovery करना impermissible है। इसके समर्थन में उन्होंने Supreme Court के Ram Kishun v. State of U.P. फैसले का हवाला दिया।


लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को क्यों नहीं माना?

Justice Shekhar B. Saraf और Justice Abdhesh Kumar Chaudhary की पीठ ने Indian Contract Act, 1872 की Section 128 पर भरोसा किया। Section 128 के तहत सामान्य नियम यह है कि surety यानी guarantor की liability principal debtor की liability के साथ co-extensive होती है, जब तक contract में इसके विपरीत कोई व्यवस्था न हो। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि “co-extensive” का मतलब है कि गारंटर की देनदारी सामान्यतः उतनी ही सीमा तक होती है जितनी principal borrower की। कोर्ट ने कहा कि creditor को principal borrower और guarantor में से किसी एक या दोनों के खिलाफ एक साथ कार्रवाई करने का अधिकार हो सकता है।


Supreme Court के कई पुराने फैसलों का सहारा

हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष को Supreme Court के कई पुराने फैसलों से भी मजबूत किया। इनमें Bank of Bihar Ltd. v. Dr. Damodar Prasad, State Bank of India v. Indexport Registered और Industrial Investment Bank of India Ltd. v. Biswanath Jhunjhunwala प्रमुख हैं। इन फैसलों में Supreme Court ने यह सिद्धांत स्थापित किया है कि creditor के लिए पहले principal borrower के खिलाफ अपने सभी remedies समाप्त करना और उसके बाद ही guarantor के खिलाफ जाना जरूरी नहीं है।

सबसे दिलचस्प मोड़: जिस Ram Kishun फैसले का हवाला दिया, वही दलील के खिलाफ चला गया


इस मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह है कि याचिकाकर्ताओं ने Supreme Court के Ram Kishun v. State of U.P. फैसले का हवाला अपने पक्ष में दिया था।

लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि Ram Kishun का फैसला वास्तव में याचिकाकर्ताओं की मदद नहीं करता। बल्कि उसमें Supreme Court ने Section 128 के तहत guarantor की co-extensive liability और creditor के principal borrower से पहले पूरी recovery करने के लिए बाध्य न होने के सिद्धांत को ही दोहराया था।  हाईकोर्ट ने petitioners की इस reliance को “self-defeating” बताते हुए कहा कि यह उनके Counsel की ओर से “self-goal” साबित हुई।


गारंटी कॉन्ट्रैक्ट में क्या लिखा था, यह क्यों महत्वपूर्ण है?

यह इस फैसले का बेहद महत्वपूर्ण fact-check point है। हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई material नहीं था जिससे यह पता चले कि guarantee agreement में कोई ऐसी शर्त थी जिसके तहत बैंक को पहले principal borrower से recovery करनी जरूरी थी और उसके बाद ही guarantors के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती थी।

कोर्ट ने इसी वजह से Section 128 की सामान्य statutory position लागू की और माना कि guarantors की liability तत्काल और co-extensive है। यानी इस फैसले को यह कहकर पेश करना सही नहीं होगा कि “हर परिस्थिति में बैंक सीधे गारंटर की salary काट सकता है।” सही कानूनी स्थिति यह है कि guarantee contract की शर्तें भी महत्वपूर्ण हैं और इस मामले में ऐसा कोई contractual restriction रिकॉर्ड पर नहीं था जो बैंक को पहले principal borrower से recovery करने के लिए बाध्य करता।


क्या बैंक दोनों से एक साथ वसूली कर सकता है?

हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा कि creditor principal borrower और guarantor दोनों के खिलाफ एक साथ कार्रवाई कर सकता है। Court ने इसे guarantee की प्रकृति के अनुरूप माना। अदालत ने कहा कि guarantor creditor को यह निर्देश नहीं दे सकता कि वह recovery किस क्रम में करे। गारंटर की liability principal borrower की liability के साथ co-extensive है, subject to the terms of the guarantee contract.


क्या वेतन से ₹10 हजार की कटौती को मंजूरी मिली?

हां। हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस मामले में बैंक द्वारा दोनों petitioners की salary से ₹10,000 प्रति माह की recovery legally sustainable है। अदालत ने दोनों writ petitions को merits से रहित माना और उन्हें dismiss कर दिया।


6 मार्च और 15 अप्रैल 2026 के पत्रों का भी रहा महत्व

मामले में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया।

रिकॉर्ड के अनुसार 6 मार्च 2026 को संबंधित respondent ने बैंक से यह स्पष्ट करने को कहा था कि principal borrower से recovery क्यों नहीं की जा रही है और guarantors से recovery क्यों प्रस्तावित है। लेकिन इसके बाद भी बैंक ने 15 अप्रैल 2026 को दोनों petitioners के वेतन से ₹10,000 प्रतिमाह काटने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

हाईकोर्ट ने माना कि 6 मार्च का यह communication statutory liability या Supreme Court के settled legal principles को override नहीं कर सकता।


Natural Justice की दलील भी खारिज

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि salary deduction के प्रस्ताव से पहले उन्हें personal hearing का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। हाईकोर्ट ने इस argument को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि जब liability contractual guarantee और Section 128 से सीधे उत्पन्न हो रही है, तो केवल personal hearing न मिलने के आधार पर guarantor contractual और statutory liability से बच नहीं सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि petitioners के पास अपनी contractual/civil remedies का इस्तेमाल करने का अवसर मौजूद था।


गारंटर के पास फिर क्या रास्ता है?

इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि गारंटर के पास कोई कानूनी remedy नहीं बचती। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि guarantor principal borrower की liability चुकाता है, तो वह principal borrower के खिलाफ अपने subrogation या contribution rights का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन इन अधिकारों के आधार पर guarantor creditor को guarantee enforce करने से रोक नहीं सकता।


हाईकोर्ट का अंतिम फैसला क्या रहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि दोनों writ petitions में कोई merit नहीं है। बैंक द्वारा दोनों petitioners के वेतन से ₹10,000 प्रति माह की प्रस्तावित recovery को कानूनी रूप से sustainable माना गया और दोनों petitions dismiss कर दी गईं। फैसला 6 अगस्त 2026 को Justice Shekhar B. Saraf और Justice Abdhesh Kumar Chaudhary की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने मामले में कोई costs भी impose नहीं की।


क्यों अहम है यह फैसला?

यह फैसला उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी चेतावनी की तरह देखा जा सकता है जो किसी दोस्त, रिश्तेदार या सहकर्मी के loan में guarantor बनने के लिए तैयार हो जाते हैं।गारंटर बनने का अर्थ केवल औपचारिक हस्ताक्षर करना नहीं है। यदि principal borrower loan repayment में default करता है, तो guarantee contract और लागू कानून के आधार पर creditor guarantor के खिलाफ भी recovery action शुरू कर सकता है। इसलिए किसी भी loan का guarantor बनने से पहले guarantee agreement की शर्तों, liability की सीमा और default की स्थिति में recovery mechanism को अच्छी तरह समझना बेहद जरूरी है।


इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि guarantor की भूमिका केवल नाम भर की औपचारिकता नहीं है। Indian Contract Act की Section 128 के तहत सामान्य स्थिति में surety की liability principal debtor के साथ co-extensive होती है। इस मामले में बैंक को principal borrower से पूरी recovery होने तक इंतजार करने के लिए बाध्य नहीं माना गया और दोनों guarantors के वेतन से ₹10,000 प्रतिमाह की proposed recovery को कानूनी रूप से सही ठहराया गया।

हालांकि, इस फैसले को “हर गारंटर की salary बिना किसी शर्त काटी जा सकती है” के रूप में समझना गलत होगा। Guarantee contract की शर्तें और मामले की परिस्थितियां महत्वपूर्ण रहेंगी।