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सरकारी कार्यक्रमों में भूमि पूजन और धार्मिक रस्में: क्या ‘संस्कृति’ के नाम पर संविधान की धर्मनिरपेक्षता को दी जा सकती है चुनौती?

क्या ‘भारतीय संस्कृति’ के नाम पर सरकारी मंच पर धार्मिक रस्में संवैधानिक रूप से जायज़ हैं? सड़क, अस्पताल, पुल या सरकारी भवन के शिलान्यास में भूमि पूजन, हवन और वैदिक मंत्रोच्चार अब आम दृश्य हैं। लेकिन जब यही रस्में राज्य के आधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा बनती हैं, तो सवाल सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि संविधान की धर्मनिरपेक्षता, समानता और राज्य की धार्मिक निष्पक्षता का बन जाता है। आखिर जब राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है, तो क्या वह किसी एक धार्मिक परंपरा से आधिकारिक तौर पर जुड़ सकता है? यही अहम संवैधानिक सवाल इस बहस के केंद्र में है।

Sonali23 अग. 2026, 05:49 PM IST
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सरकारी कार्यक्रमों में भूमि पूजन और धार्मिक रस्में: क्या ‘संस्कृति’ के नाम पर संविधान की धर्मनिरपेक्षता को दी जा सकती है चुनौती?

भारत में सड़क, पुल, अस्पताल, स्कूल, सरकारी भवन या न्यायिक परिसर के शिलान्यास और उद्घाटन समारोहों में भूमि पूजन, हवन, नारियल फोड़ने और वैदिक मंत्रोच्चार जैसी रस्में अब आम दिखाई देती हैं। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, राज्यपाल और अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी कई बार ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। हालांकि, इन रस्मों को अक्सर भारतीय संस्कृति, परंपरा और सभ्यतागत विरासत का हिस्सा बताकर उचित ठहराया जाता है, लेकिन इनके संवैधानिक पहलू पर एक गंभीर सवाल उठता है—क्या राज्य के आधिकारिक कार्यक्रम में किसी एक धर्म से जुड़ी धार्मिक रस्म को शामिल किया जा सकता है?

संविधान के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या?

भारत का संविधान किसी धर्म को राज्य का धर्म घोषित नहीं करता। संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘Secular’ यानी धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कहा गया है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता का मॉडल अमेरिका या फ्रांस की तरह धर्म और राज्य के बीच पूर्ण अलगाव पर आधारित नहीं है। भारतीय व्यवस्था सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान और राज्य की धार्मिक निष्पक्षता पर जोर देती है। ऐसे में सवाल यह है कि जब कोई सरकारी या संवैधानिक संस्था किसी आधिकारिक समारोह में विशेष रूप से हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़ी रस्म को अपनाती है, तो क्या वह केवल सांस्कृतिक परंपरा का प्रदर्शन है या इससे राज्य की धार्मिक neutrality पर सवाल उठ सकता है?

S.R. Bommai मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

इस बहस में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला S.R. Bommai v. Union of India महत्वपूर्ण है। नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान के Basic Structure का हिस्सा माना था। इस फैसले का व्यापक संवैधानिक सिद्धांत यह है कि सरकार की वैधता किसी धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि संविधान से आती है। राज्य किसी विशेष धर्म के पक्ष में अपनी पहचान स्थापित नहीं कर सकता। यही सिद्धांत सरकारी समारोहों में धार्मिक प्रतीकों और अनुष्ठानों की भूमिका पर भी संवैधानिक सवाल खड़ा करता है।

‘संस्कृति’ कह देने से धार्मिक स्वरूप खत्म हो जाता है?

भूमि पूजन, हवन या वैदिक मंत्रोच्चार को अक्सर धार्मिक अनुष्ठान के बजाय भारतीय संस्कृति और परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन संवैधानिक परीक्षण में केवल नाम या औचित्य पर्याप्त नहीं हो सकता। सवाल यह भी होगा कि उस रस्म की प्रकृति क्या है, वह किस धार्मिक परंपरा से जुड़ी है और उसे किस हैसियत से सरकारी कार्यक्रम में शामिल किया गया है। यदि किसी सरकारी परियोजना के आधिकारिक शिलान्यास समारोह में राज्य की ओर से एक विशिष्ट धार्मिक परंपरा का अनुष्ठान कराया जाता है, तो यह जांच का विषय बन सकता है कि क्या राज्य किसी एक धार्मिक पहचान से स्वयं को जोड़ रहा है।

क्या इसका मतलब सरकारी कार्यक्रमों से धर्म को पूरी तरह बाहर करना होगा?

जरूरी नहीं। भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में धर्म का कोई स्थान नहीं होगा। संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और राज्य सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करने के लिए बाध्य है। इसलिए संवैधानिक बहस का केंद्र यह नहीं है कि धार्मिक आस्था सार्वजनिक जीवन में दिखाई दे सकती है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या राज्य स्वयं किसी विशेष धर्म की धार्मिक प्रथा को आधिकारिक रूप से अपनाता या उसका समर्थन करता हुआ दिखाई दे रहा है?

व्यक्ति और राज्य की भूमिका में अंतर

किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री या अधिकारी की व्यक्तिगत धार्मिक आस्था और राज्य की आधिकारिक कार्रवाई को एक समान नहीं माना जा सकता। एक सार्वजनिक पदाधिकारी अपनी निजी क्षमता में किसी धार्मिक अनुष्ठान में भाग ले सकता है। लेकिन जब वही व्यक्ति सरकारी संस्था या राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए किसी आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल होता है, तो उसकी भूमिका संवैधानिक पद से जुड़ जाती है। यहीं से व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य की धार्मिक neutrality के बीच अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है।

सरकारी भवन से लेकर कोर्ट कॉम्प्लेक्स तक सवाल

यह संवैधानिक बहस केवल सड़क या पुल के शिलान्यास तक सीमित नहीं है। यदि सरकारी अस्पताल, विश्वविद्यालय, विधानसभा भवन, सरकारी कार्यालय या न्यायिक परिसर जैसे संस्थानों के उद्घाटन और शिलान्यास में धार्मिक रस्में आधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा बनती हैं, तो राज्य की निष्पक्षता का सवाल और गंभीर हो जाता है।

विशेष रूप से न्यायालयों जैसे संवैधानिक संस्थानों के मामले में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या किसी एक धार्मिक परंपरा से जुड़ा आयोजन संस्था की धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक पहचान के अनुरूप है।

‘सर्वधर्म सम्मान’ और ‘किसी एक धर्म की आधिकारिक पहचान’ में फर्क

भारतीय संविधान सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान की अनुमति देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य किसी एक धर्म को अपनी आधिकारिक पहचान का आधार बना सकता है। यही वह सीमा है जिस पर धार्मिक परंपरा और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के बीच बहस केंद्रित होती है। यदि किसी समारोह में धार्मिक अनुष्ठान केवल व्यक्तिगत आस्था के स्तर पर है, तो स्थिति अलग हो सकती है। लेकिन यदि उसे राज्य के आधिकारिक कार्यक्रम का अनिवार्य या प्रमुख हिस्सा बनाया जाता है, तो समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और secularism से जुड़े संवैधानिक सवाल उठ सकते हैं।

 ‘परंपरा’ और ‘संवैधानिक तटस्थता’ के बीच संतुलन जरूरी

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को देखते हुए सरकारी समारोहों में परंपराओं की भूमिका का सवाल आसान नहीं है। लेकिन संवैधानिक व्यवस्था की मूल भावना यह सुनिश्चित करना है कि राज्य किसी एक धार्मिक पहचान से स्वयं को न जोड़े। इसलिए भूमि पूजन, हवन या वैदिक मंत्रोच्चार को केवल ‘संस्कृति’ कह देना इस संवैधानिक प्रश्न का अंतिम उत्तर नहीं हो सकता। असली कसौटी यह होगी कि राज्य की कार्रवाई सभी नागरिकों के प्रति समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं। यही बहस भारत में ‘संस्कृति’ और ‘Secular State’ के बीच संवैधानिक संतुलन को समझने के लिए महत्वपूर्ण बन जाती है।