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स्कूल भवनों की सुरक्षा कब होगी पक्की? सोलापुर में स्लैब गिरने से 13 छात्र घायल
महाराष्ट्र के सोलापुर के बबलाद गांव में जिला परिषद स्कूल का स्लैब गिरने से 13 छात्र घायल हो गए। यह घटना स्कूल भवनों की सुरक्षा और नियमित structural audit पर गंभीर सवाल खड़े करती है। राजस्थान के झालावाड़ में 2025 में स्कूल की छत गिरने से 7 बच्चों की मौत और 20 से अधिक घायल होने की घटना के बाद भी स्कूल भवनों की सुरक्षा चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार नियमित structural audit, जर्जर भवनों को समय पर खाली कराना, मानसून से पहले निरीक्षण और मरम्मत के लिए जवाबदेही तय करना ऐसे हादसों को रोकने में अहम हो सकता है।
Anshuman Mishra13 अग. 2026, 09:40 PM IST

सोलापुर: महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के अक्कलकोट तालुका के बबलाद गांव में जिला परिषद स्कूल में स्लैब का एक हिस्सा अचानक गिरने से 13 छात्र घायल हो गए। हादसा स्कूल समय के दौरान हुआ। घटना के बाद शिक्षक और स्थानीय लोग बच्चों की मदद के लिए पहुंचे और प्रशासन की ओर से एंबुलेंस के जरिए घायल छात्रों को उपचार के लिए ले जाया गया। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक सभी घायल छात्रों को प्राथमिक उपचार दिया गया और किसी की मौत की सूचना नहीं है। लेकिन सोलापुर का यह हादसा केवल एक स्कूल के स्लैब गिरने की खबर नहीं है। सवाल यह है कि देशभर में जहां लाखों बच्चे रोज स्कूल की इमारतों के अंदर कई घंटे बिताते हैं, वहां भवन की मजबूती की जांच कितनी नियमित और गंभीरता से होती है?
सोलापुर के बाद फिर वही सवाल—स्कूल भवन कितने सुरक्षित?
भारत में करीब 14.71 लाख स्कूल हैं और इनमें लगभग 24.69 करोड़ छात्र पढ़ते हैं। इतने बड़े स्कूल नेटवर्क में भवनों की नियमित निगरानी और रखरखाव बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। UDISE+ 2024-25 के आंकड़े देश में स्कूलों और बुनियादी ढांचे की विशाल संख्या को दिखाते हैं। NCPCR की ‘Safe and Secure School Environment’ रिपोर्ट में भी स्कूल भवनों की स्थिति को लेकर गंभीर कमियां दर्ज की गई थीं। रिपोर्ट में पुराने या जर्जर भवनों में संचालित स्कूलों और भवनों में दरारों की समस्या सामने आई थी। यानी स्कूलों की structural safety की चिंता नई नहीं है।
एक साल पहले राजस्थान में हुआ था बड़ा हादसा
सोलापुर की घटना से करीब एक साल पहले राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव में सरकारी स्कूल की छत का हिस्सा ढह गया था। 25 जुलाई 2025 के इस हादसे में 7 बच्चों की मौत हुई और 20 से अधिक छात्र घायल हुए थे। उस हादसे के बाद राजस्थान में स्कूल भवनों की सुरक्षा जांच, जर्जर भवनों को बंद करने और मरम्मत जैसे कदमों की घोषणा की गई। जांच के लिए समिति बनाई गई और स्कूल के प्रधानाचार्य तथा शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई। यानी एक तरफ झालावाड़ जैसी घटना में जान चली जाती है, दूसरी तरफ सोलापुर में बच्चे घायल होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार हादसा बड़ा होने से पहले रुक गया।
महाराष्ट्र में भी पहले उठ चुके हैं सवाल
स्कूल भवनों की structural safety को लेकर महाराष्ट्र में भी पहले कदम उठाए गए हैं। जुलाई 2025 में राज्य के एक मंत्री ने बताया था कि अहमदनगर जिले में सरकारी प्राथमिक स्कूलों के structural audit के बाद 2,538 कक्षाओं को उपयोग से बाहर किया गया, 1,462 नई कक्षाओं का निर्माण पूरा हुआ और 3,435 कक्षाओं की मरम्मत की गई। यह आंकड़ा बताता है कि structural audit के बाद बड़ी संख्या में भवनों में सुधार की जरूरत सामने आ सकती है। यहां सबसे अहम सवाल है—अगर कोई इमारत audit में असुरक्षित पाई जाती है, तो उसे बच्चों के इस्तेमाल में आने से रोकने और वैकल्पिक व्यवस्था करने में कितनी तेजी दिखाई जाती है?
स्कूल भवन की सुरक्षा का मतलब सिर्फ यह देखना नहीं है कि छत गिर रही है या नहीं। एक सुरक्षित स्कूल के लिए कई चीजों की नियमित जांच जरूरी है—
- छत, स्लैब और बीम की structural stability
- दीवारों में दरार और नींव की स्थिति
- बारिश के पानी की निकासी और water seepage
- बिजली के तार और electrical panels
- सीढ़ियां, रेलिंग और स्कूल की boundary wall
- खिड़की-दरवाजे और स्कूल गेट
- अग्नि सुरक्षा व्यवस्था
- आपातकालीन निकास
- भूकंप या अन्य आपदा की स्थिति में evacuation व्यवस्था
केंद्र की PM SHRI school guidelines में भी building safety, disaster management plan और emergency evacuation जैसी व्यवस्थाओं को स्कूल सुरक्षा का हिस्सा बनाया गया है।
हादसे के बाद कार्रवाई नहीं, हादसे से पहले कार्रवाई जरूरी
पहला कदम—हर स्कूल का structural audit।
सिर्फ कागज पर निरीक्षण नहीं, बल्कि qualified structural engineer से भवन की वास्तविक जांच हो।
दूसरा कदम—स्कूलों की risk grading।
हर स्कूल को Green, Yellow और Red जैसी श्रेणियों में रखा जा सकता है। Red category के भवनों में बच्चों की कक्षाएं तुरंत बंद होनी चाहिए।
तीसरा कदम—बारिश से पहले अनिवार्य inspection।
मॉनसून से पहले छत, drainage, leakage, plaster, electrical wiring और दीवारों की जांच अनिवार्य होनी चाहिए।
चौथा कदम—मरम्मत का सार्वजनिक रिकॉर्ड।
किस स्कूल का audit कब हुआ, क्या कमी मिली, कितनी राशि मंजूर हुई और मरम्मत कब पूरी हुई—यह जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक की जा सकती है।
पांचवां कदम—जिम्मेदारी तय हो।
अगर किसी भवन को असुरक्षित घोषित किए जाने के बावजूद उसमें बच्चों को बैठाया जाता है और हादसा होता है, तो सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई के बजाय जिम्मेदारी की पूरी chain की जांच होनी चाहिए। जर्जर स्कूल को बंद करना समाधान है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई का क्या? किसी खतरनाक भवन को सिर्फ इसलिए चालू रखना कि बच्चों के लिए दूसरा स्कूल उपलब्ध नहीं है, स्वीकार्य नहीं हो सकता। लेकिन स्कूल बंद करना भी अकेला समाधान नहीं है। ऐसी स्थिति में प्रशासन को तुरंत: वैकल्पिक कक्षाएं, अस्थायी सुरक्षित भवन, nearby school में अतिरिक्त व्यवस्था या सुरक्षित modular classrooms उपलब्ध कराने चाहिए, ताकि बच्चों की पढ़ाई भी न रुके और उनकी जान भी जोखिम में न पड़े।
सिर्फ सरकारी स्कूलों का सवाल नहीं
स्कूल सुरक्षा को सरकारी और निजी स्कूलों के बीच बांटना भी गलत होगा। NCPCR की स्कूल-सुरक्षा रिपोर्ट ने लंबे समय से विभिन्न प्रकार के स्कूलों में infrastructure और safety gaps की ओर ध्यान दिलाया है। बच्चों की सुरक्षा का मानक स्कूल की फीस या प्रबंधन के प्रकार से तय नहीं होना चाहिए। महाराष्ट्र में Fire & Emergency Services भी स्कूलों के लिए fire-safety audit और सुरक्षा संबंधी प्रावधान उपलब्ध कराता है। यानी सुरक्षा के लिए नियम और दिशानिर्देश मौजूद हैं; चुनौती उनके नियमित और प्रभावी implementation की है।
