लॉ-एंड-आर्डर
यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था पर हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन! हर जिले का मांगा रिपोर्ट कार्ड, एसीएस तलब
क्या उत्तर प्रदेश के हर जिले में मरीजों को समय पर बेहतर इलाज मिल रहा है? क्या सरकारी अस्पतालों में मौजूद वेंटिलेटर वास्तव में जरूरतमंद मरीजों के काम आ रहे हैं? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से स्वास्थ्य व्यवस्था का पूरा हिसाब-किताब तलब किया है। अदालत ने अधूरी जानकारी देने पर नाराजगी जताते हुए चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव (एसीएस) को तलब किया और प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। 21 सितंबर 2026 को अगली सुनवाई तय की है।

लखनऊ।
उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर गंभीर चिंता जताई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार से प्रदेश के सभी जिलों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं, वेंटिलेटरों, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों, निजी अस्पतालों और क्लीनिकों के नियमन तथा सुपर स्पेशियलिटी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता का विस्तृत ब्यौरा मांगा है। अदालत ने कहा कि स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े मामलों में केवल आंकड़े प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सरकार को यह भी बताना होगा कि आम नागरिकों को समय पर गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल रहा है या नहीं।
यह मामला वर्ष 2016 में दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) से जुड़ा है, जिसे "वी द पीपल" संस्था के महासचिव प्रिंस लेनिन ने दाखिल किया था। याचिका में सरकारी अस्पतालों और मेडिकल विश्वविद्यालयों में वेंटिलेटरों की उपलब्धता, गंभीर मरीजों के उपचार, विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी और प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की मांग उठाई गई थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि राज्य सरकार द्वारा 16 जुलाई 2026 को दाखिल जवाबी हलफनामा अधूरा है और उसमें कई महत्वपूर्ण जानकारियों का अभाव है। इसी कारण चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। उनके उपस्थित होने के बाद अदालत ने सभी बिंदुओं पर विस्तृत पूरक हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया और मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर 2026 निर्धारित की।
इस मामले की पूर्व सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि यदि किसी मरीज को जरूरत पड़ने पर समय पर वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं कराया जा सकता, तो केवल अस्पतालों में उपलब्ध वेंटिलेटरों की संख्या बताने का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। अदालत ने कहा था कि सरकार को यह भी बताना होगा कि किसी भी दिन वास्तविक आवश्यकता के मुकाबले कितने मरीजों को समय पर वेंटिलेटर उपलब्ध हो पाते हैं और इसके लिए कोई प्रभावी व्यवस्था है या नहीं। खंडपीठ ने यह भी चिंता व्यक्त की थी कि सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के अपेक्षाकृत कम वेतन के कारण अनुभवी चिकित्सक निजी अस्पतालों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे सरकारी अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं प्रभावित होती हैं और इसका सीधा असर आम नागरिकों के जीवन के अधिकार पर पड़ता है। अदालत ने कहा था कि स्वास्थ्य सेवाएं किसी भी राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में होनी चाहिए क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जुड़ा विषय है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी पूछा है कि नए मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में उपलब्ध संसाधन स्थानीय आबादी की जरूरतों को किस सीमा तक पूरा कर रहे हैं। अदालत ने यह जानकारी भी मांगी है कि पिछले पांच वर्षों में वेंटिलेटर संचालन के लिए कितने प्रशिक्षित तकनीकी कर्मियों की भर्ती की गई, निजी अस्पतालों और क्लीनिकों की निगरानी के लिए क्या प्रभावी नियामक व्यवस्था लागू है तथा प्रदेश के अन्य जिलों में लखनऊ की तर्ज पर कितने सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल स्थापित किए गए हैं या भविष्य में स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है। अदालत का मानना है कि यदि ऐसी सुविधाएं केवल राजधानी तक सीमित रहेंगी तो दूरदराज के जिलों के मरीजों को अनावश्यक रूप से लखनऊ का रुख करना पड़ेगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन केवल राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के न्यूनतम मानकों के आधार पर नहीं किया जा सकता। सरकार को वास्तविक जरूरतों का आकलन करते हुए स्वास्थ्य ढांचे का विस्तार करना होगा ताकि किसी भी मरीज की जान केवल संसाधनों की कमी के कारण खतरे में न पड़े।
अब राज्य सरकार को विस्तृत पूरक हलफनामा दाखिल कर यह बताना होगा कि प्रदेश के प्रत्येक जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति क्या है, कितने वेंटिलेटर कार्यशील हैं, प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता कितनी है, निजी अस्पतालों की निगरानी किस प्रकार की जा रही है तथा भविष्य में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए क्या ठोस योजनाएं लागू की जा रही हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर 2026 को होगी।
