culture

खिडकालीश्वर महादेव मंदिर: जहां स्वयं भगवान शिव ने पांडवों को दिए थे दर्शन; हेमाडपंथी स्थापत्य और प्राचीन आस्था का अद्भुत संगम

ठाणे जिले के खिडकाली गांव स्थित खिडकालीश्वर महादेव मंदिर जिले के सबसे प्राचीन शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। काले पत्थरों से निर्मित यह मंदिर हेमाडपंथी स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। मान्यता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर पांडवों को दर्शन दिए थे, जिसके बाद उन्होंने यहां मंदिर का निर्माण कराया। महाशिवरात्रि पर काशी, अयोध्या और उत्तराखंड से सैकड़ों साधु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

Priyanka Gaikwad05 अग. 2026, 06:43 PM IST
खबर शेयर करें:
खिडकालीश्वर महादेव मंदिर: जहां स्वयं भगवान शिव ने पांडवों को दिए थे दर्शन; हेमाडपंथी स्थापत्य और प्राचीन आस्था का अद्भुत संगम
ठाणे (Thane): ठाणे जिले के खिडकाली गांव स्थित खिडकालीश्वर महादेव मंदिर अपनी प्राचीनता, धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र माना जाता है। अंबरनाथ के प्रसिद्ध शिव मंदिर से स्थापत्य की समानता रखने वाला यह मंदिर काले पत्थरों से निर्मित हेमाडपंथी वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। मान्यता है कि भगवान शिव ने स्वयं यहां प्रकट होकर पांडवों को दर्शन दिए थे और उनकी स्मृति में पांडवों ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, वनवास के दौरान दंडकारण्य में भ्रमण करते समय पांडवों को यहां स्वयंभू शिवलिंग प्राप्त हुआ। युधिष्ठिर सहित पांचों पांडव भगवान शिव की आराधना करने लगे। उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उनके सामने पहुंचे और सूर्यास्त से पहले पांच फूल लाने को कहा।
WhatsApp Image 2026-08-05 at 5.31.41 PM.jpeg


पूजा चल रही थी, इसलिए युधिष्ठिर ने सहदेव को पूजा जारी रखने के लिए कहा और स्वयं भीम, अर्जुन तथा नकुल फूलों की खोज में निकल पड़े। काफी प्रयास के बाद भी उन्हें फूल नहीं मिले। सूर्यास्त निकट आने पर अर्जुन को एक तालाब में खिले कमल के फूल दिखाई दिए। जब वह फूल तोड़ रहे थे, तभी पहाड़ी से एक विशाल शिला उनकी ओर लुढ़कने लगी। भीम ने अपनी शक्ति से उस शिला को रोककर अर्जुन के प्राण बचाए। अर्जुन ने कमल नकुल को सौंपे और नकुल समय रहते ब्राह्मण तक पहुंच गए, जबकि सहदेव लगातार मंत्रोच्चार करते रहे। पांडवों की भक्ति, सेवा और एकता से प्रसन्न होकर भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और उन्हें कौरवों के साथ होने वाले महाभारत युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया। इसके बाद पांडवों ने उसी स्थान पर भगवान शिव का मंदिर बनवाया। इतिहास में इस मंदिर के 17वीं शताब्दी में जीर्णोद्धार का भी उल्लेख मिलता है।

कल्याण-शिल मार्ग पर खिडकाली गांव के तालाब के किनारे स्थित इस मंदिर तक पहुंचने वाले मार्ग पर वट, पीपल, उंबर और इमली जैसे प्राचीन वृक्ष श्रद्धालुओं का स्वागत करते हैं। इन वृक्षों के नीचे फूल, बेलपत्र, नारियल, प्रसाद और पूजा सामग्री की दुकानें लगी रहती हैं। मंदिर के समीप स्थित वटवृक्ष के चबूतरे पर भगवान गणेश, शिव-पार्वती, स्वामी समर्थ तथा मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिसर में शेड बनाए गए हैं। मंदिर के बाहरी भाग के दोनों ओर सिंहों की आकर्षक पत्थर की प्रतिमाएं हैं। मंदिर की दीवारों, स्तंभों, प्रवेश द्वार, खिड़कियों और कोटरों पर की गई सुंदर नक्काशी इसकी प्राचीन वास्तुकला की भव्यता को दर्शाती है।

मंदिर की संरचना सभामंडप, अंतराल और गर्भगृह में विभाजित है। सभामंडप में काले पत्थर से निर्मित विशाल नंदी की प्रतिमा स्थापित है। परिसर में अनेक देवी-देवताओं की सिंदूर से अलंकृत प्रतिमाएं हैं। नंदी के सामने बाईं ओर भगवान गणेश तथा दाईं ओर शीतला माता की प्रतिमा विराजमान है। गर्भगृह तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को कुछ सीढ़ियां नीचे उतरनी पड़ती हैं। यहां स्थित स्वयंभू शिवलिंग चांदी के आवरण से सुशोभित है तथा उसके ऊपर पांच फनों वाले चांदी के नाग का छत्र स्थापित है। शिवलिंग के पीछे माता पार्वती की प्रतिमा विराजमान है।

WhatsApp Image 2026-08-05 at 5.29.21 PM.jpeg

मंदिर परिसर में अनेक संतों और साधुओं की समाधियां स्थित हैं। मंदिर के निकट स्वामी शिवानंद महाराज का समाधि मंदिर है। समाधि के पीछे भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा स्थापित है। वर्ष 1934 में स्वामी शिवानंद महाराज ने इसी स्थान पर जीवित समाधि ली थी। मंदिर के सामने विशाल यज्ञमंडप और सभामंडप है, जहां प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। प्रत्येक सोमवार को भगवान खिडकालीश्वर के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। श्रावण मास के सोमवार को यहां मेले जैसा वातावरण रहता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर विशाल यात्रा आयोजित होती है, जिसमें काशी, अयोध्या तथा उत्तराखंड से सैकड़ों साधु-संत दर्शन के लिए आते हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए ठाणे, कल्याण और डोंबिवली से महाराष्ट्र राज्य परिवहन (एसटी) तथा शहर परिवहन की विशेष बसें प्रत्येक पांच से दस मिनट के अंतराल पर चलाई जाती हैं।

वर्ष 2023 में महाराष्ट्र सरकार ने मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए पांच करोड़ रुपये की निधि स्वीकृत की थी। मंदिर के सामने स्थित खिडकाली तालाब लगभग सवा चार एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। यह ठाणे जिले के प्राचीन तालाबों में शामिल है। गर्मियों में जलस्तर कुछ कम होने के बावजूद यह तालाब कभी पूरी तरह सूखता नहीं है। तालाब के चारों ओर बनी सीढ़ियों से श्रद्धालु पानी तक पहुंच सकते हैं। इसके चारों ओर पैदल मार्ग तथा दूसरी ओर जाने के लिए एक पुल बनाया गया है। तालाब के दूसरी ओर धार्मिक अनुष्ठान और दशक्रिया संस्कार संपन्न किए जाते हैं। मंदिर परिसर में संत ज्ञानेश्वर महाराज मुंढे द्वारा स्थापित संत सावळाराम गोशाला भी स्थित है।