culture
बदलापुर की चाबी के आकार वाली प्राचीन बावड़ी बनी पर्यटकों का आकर्षण; भीषण सूखे में भी नहीं सूखता पानी
महाराष्ट्र के ठाणे जिले के बदलापुर के देवळोली गांव में स्थित चाबी के आकार की प्राचीन बावड़ी अपनी अनोखी बनावट, ऐतिहासिक महत्व और सालभर पानी से भरे रहने की विशेषता के कारण पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित कर रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि शिवकालीन यह बावड़ी भीषण सूखे के दौरान भी कभी नहीं सूखती।
Priyanka Gaikwad05 अग. 2026, 06:43 PM IST

बदलापुर (Badlapur) : महाराष्ट्र के ठाणे जिले का बदलापुर शहर अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव के लिए जाना जाता है। शहर से लगभग छह किलोमीटर दूर स्थित देवळोली गांव में एक अनोखी प्राचीन बावड़ी आज भी इतिहास की जीवंत मिसाल बनकर खड़ी है। चाबी के आकार में बनी यह दुर्लभ बावड़ी अपनी स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व के कारण पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गई है। करीब 60 घरों वाले इस छोटे से गांव में मौजूद यह बावड़ी पूरी तरह काले पत्थरों से निर्मित है। स्थानीय जानकारों के अनुसार इसका निर्माण लगभग 16वीं शताब्दी, यानी शिवकाल के दौरान हुआ माना जाता है।
इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे केवल बड़े-बड़े पत्थरों को एक-दूसरे पर जमाकर बनाया गया है। निर्माण में न तो चूने का इस्तेमाल किया गया और न ही किसी अन्य प्रकार के गारे का। बावड़ी की गहराई लगभग 70 से 72 फीट बताई जाती है। नीचे उतरने के लिए पत्थरों की मजबूत सीढ़ियां बनाई गई हैं। बावड़ी के मध्य भाग में भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमा उकेरी गई है, जबकि किनारों की दीवारों पर हाथियों की कलात्मक नक्काशी देखने को मिलती है। ये शिल्प उस समय की उत्कृष्ट स्थापत्य कला और शिल्पकला का प्रमाण माने जाते हैं।
इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे केवल बड़े-बड़े पत्थरों को एक-दूसरे पर जमाकर बनाया गया है। निर्माण में न तो चूने का इस्तेमाल किया गया और न ही किसी अन्य प्रकार के गारे का। बावड़ी की गहराई लगभग 70 से 72 फीट बताई जाती है। नीचे उतरने के लिए पत्थरों की मजबूत सीढ़ियां बनाई गई हैं। बावड़ी के मध्य भाग में भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमा उकेरी गई है, जबकि किनारों की दीवारों पर हाथियों की कलात्मक नक्काशी देखने को मिलती है। ये शिल्प उस समय की उत्कृष्ट स्थापत्य कला और शिल्पकला का प्रमाण माने जाते हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस बावड़ी का पानी कभी नहीं सूखता। भीषण गर्मी और सूखे जैसी परिस्थितियों में भी इसमें पर्याप्त जल बना रहता है। गांव में नल जल योजना शुरू होने से पहले वर्षों तक ग्रामीणों की पेयजल आवश्यकता इसी बावड़ी से पूरी होती थी। ग्रामीणों के अनुसार, बाहर का तापमान कितना भी अधिक क्यों न हो, बावड़ी का पानी हमेशा ठंडा और स्वच्छ बना रहता है। ग्रामीणों का यह भी मानना है कि शिवकाल में बदलापुर कोकण और घाटमाथा को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव था। उस समय घुड़सवार सैनिक और संदेशवाहक यहां घोड़े बदलने तथा विश्राम के लिए रुकते थे। माना जाता है कि यात्रियों और सैनिकों की पानी की आवश्यकता पूरी करने के उद्देश्य से इसी काल में इस बावड़ी का निर्माण कराया गया था।
देवळोली गांव में आज भी कई ऐसे मकान मौजूद हैं जिनका निर्माण स्वतंत्रता से पहले हुआ था। समय के साथ इन ऐतिहासिक इमारतों की स्थिति जर्जर होती जा रही है, लेकिन उनकी पारंपरिक वास्तुकला आज भी लोगों को आकर्षित करती है। ग्रामीणों का कहना है कि ऐतिहासिक धरोहरों से समृद्ध इस गांव के संरक्षण और विकास के लिए अब तक पर्याप्त सरकारी प्रयास नहीं किए गए हैं। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से इस प्राचीन बावड़ी और गांव की अन्य विरासत संरचनाओं के संरक्षण, सौंदर्यीकरण तथा पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग की है।
