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तुलजा भवानी मंदिर: महाराष्ट्र की कुलस्वामिनी का जागृत शक्तिपीठ; इतिहास, पौराणिक परंपरा और छत्रपति शिवाजी महाराज से अटूट संबंध

महाराष्ट्र के धाराशिव (पूर्व नाम उस्मानाबाद) जिले के तुलजापुर में स्थित श्री तुलजा भवानी मंदिर राज्य के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक है और देशभर के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। आदिशक्ति तुलजा भवानी को अनेक मराठी परिवारों की कुलदेवी माना जाता है। प्राचीन इतिहास, हेमाड़पंथी स्थापत्य शैली, पौराणिक महत्व और छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़े ऐतिहासिक संबंधों के कारण यह मंदिर महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

Priyanka Gaikwad05 अग. 2026, 06:41 PM IST
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तुलजा भवानी मंदिर: महाराष्ट्र की कुलस्वामिनी का जागृत शक्तिपीठ; इतिहास, पौराणिक परंपरा और छत्रपति शिवाजी महाराज से अटूट संबंध
धाराशिव जिले के तुलजापुर शहर में बालाघाट पर्वतमाला की गोद में स्थित श्री तुलजा भवानी मंदिर महाराष्ट्र के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। साढ़े तीन शक्तिपीठों में शामिल इस मंदिर में वर्षभर लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। महाराष्ट्र के अलावा कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गोवा, गुजरात तथा देश के अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण यादवकाल में हुआ था। इसके बाद विभिन्न राजवंशों के शासनकाल में मंदिर का विस्तार और जीर्णोद्धार किया गया। हेमाड़पंथी स्थापत्य शैली में निर्मित यह मंदिर आज भी अपनी भव्य वास्तुकला के कारण श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पत्थरों की सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं, जो इसकी विशेष पहचान मानी जाती है।

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पौराणिक कथाओं के अनुसार अनुभूति नामक एक पतिव्रता महिला कठोर तपस्या कर रही थीं। उसी दौरान कुकुर अथवा मातंग नामक राक्षस ने उन पर आक्रमण किया। भक्त की पुकार सुनकर आदिशक्ति प्रकट हुईं और राक्षस का वध कर अनुभूति की रक्षा की। इसके बाद देवी ने इसी स्थान पर निवास करने का संकल्प लिया और तभी से यह स्थान तुलजा भवानी शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। श्री तुलजा भवानी देवी को छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलस्वामिनी माना जाता है। मान्यता है कि स्वराज्य की स्थापना के महान अभियान के दौरान शिवाजी महाराज ने देवी का आशीर्वाद प्राप्त किया था। भवानी तलवार से जुड़ी लोकमान्यता भी इसी मंदिर से जुड़ी हुई है, जिससे इस देवस्थान का ऐतिहासिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर से निर्मित स्वयंभू मानी जाने वाली अष्टभुजा तुलजा भवानी की प्रतिमा विराजमान है। माता के हाथों में विभिन्न दिव्य आयुध हैं और उन्हें महिषासुर का वध करते हुए दर्शाया गया है। मंदिर परिसर में कालभैरव, चिंतामणि, खंडोबा और नरसिंह सहित कई उपमंदिर, पवित्र तीर्थकुंड तथा दीपमालाएं भी स्थित हैं। प्रतिदिन प्रातःकाल काकड़ आरती के साथ मंदिर की पूजा-अर्चना प्रारंभ होती है। इसके बाद अभिषेक, महापूजा, धूप आरती, शयन आरती, ओटी भरना, गोंधल तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान पूरे वर्ष आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर माता को साड़ी, चुनरी, नारियल, पुष्प और प्रसाद अर्पित करते हैं।

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शारदीय नवरात्र महोत्सव तुलजा भवानी मंदिर का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव माना जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में विशेष पूजन, पालकी यात्रा, धार्मिक अनुष्ठान तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दौरान लाखों श्रद्धालु तुलजापुर पहुंचते हैं और पूरा शहर भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है। चैत्र नवरात्र और विजयादशमी के अवसर पर भी यहां विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए दर्शन व्यवस्था, प्रसाद केंद्र, भक्त निवास, धर्मशाला, वाहन पार्किंग, पेयजल, सुरक्षा तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।

मंदिर संस्थान और महाराष्ट्र सरकार द्वारा श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए समय-समय पर विकास कार्य भी किए जा रहे हैं। श्रद्धा, शक्ति और पराक्रम का प्रतीक माना जाने वाला श्री तुलजा भवानी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है। आज भी लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं और यह पवित्र धाम महाराष्ट्र की धार्मिक पहचान के प्रमुख केंद्रों में अपना विशेष स्थान बनाए हुए है।